दीपावली से पहले दैनिक वेतनभोगियों पर रोजगार का संकट, नियमितीकरण का वादा अधूरा!
वर्षों तक सरकारी विभागों में सेवा देने वाले कर्मचारियों को बिना सूचना हटाने का आरोप, त्योहार से पहले परिवारों के सामने आर्थिक संकट
रायपुर। दीपावली की रोशनी से पहले छत्तीसगढ़ के हजारों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के जीवन में रोजगार का अंधेरा गहराने लगा है। जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक शासकीय विभागों में अपनी सेवाएं देकर व्यवस्था को मजबूती दी, आज उन्हीं के सामने नौकरी बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। आरोप है कि विभिन्न विभागों में दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों को बिना पूर्व सूचना, स्पष्ट कारण और उचित प्रक्रिया के काम से पृथक किया जा रहा है। यदि यह स्थिति सही है, तो यह केवल रोजगार का मामला नहीं, बल्कि कर्मचारियों के सम्मान, अधिकार और भविष्य से जुड़ा गंभीर सवाल है।
चुनावी वादा, लेकिन कर्मचारियों के हाथ अब भी खाली
विधानसभा चुनाव के दौरान दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितीकरण को लेकर 100 दिनों के भीतर ठोस पहल करने का वादा किया गया था। इस घोषणा ने वर्षों से अस्थायी रोजगार के सहारे जीवन गुजार रहे कर्मचारियों में नई उम्मीद जगाई थी। उन्हें लगा था कि अब उनकी सेवा को स्थायित्व मिलेगा और परिवार का भविष्य सुरक्षित होगा।
लेकिन कर्मचारियों का आरोप है कि नियमितीकरण की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए। इसके उलट, अब नौकरी से हटाए जाने की घटनाएं उनकी उम्मीदों पर पानी फेर रही हैं। सवाल उठता है कि जब कर्मचारियों को नियमित करने की बात कही गई थी, तो उन्हें रोजगार से बाहर करने की नौबत क्यों आ रही है?
त्योहार के पहले बेरोजगारी की मार
दीपावली खुशियों, उत्साह और परिवार के साथ त्योहार मनाने का अवसर है। लेकिन जिन कर्मचारियों की रोजी-रोटी छिनने का खतरा मंडरा रहा है, उनके लिए यह पर्व चिंता और आर्थिक दबाव लेकर आ सकता है। महंगाई के दौर में सीमित वेतन से परिवार चलाने वाले कर्मचारियों के सामने बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और त्योहार की जरूरतें पूरी करना पहले ही चुनौती है। ऐसे में काम से पृथक किए जाने की कार्रवाई परिवारों की मुश्किलें बढ़ा सकती है।
सरकार से जवाब मांग रहे कर्मचारी
कर्मचारियों की मांग है कि बिना पूर्व सूचना सेवा से पृथक करने की कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाई जाए, प्रभावित कर्मचारियों को वापस काम पर रखा जाए और नियमितीकरण के वादे पर स्पष्ट समय-सीमा के साथ निर्णय लिया जाए।
अब सवाल सरकार से है—क्या वर्षों तक सेवाएं देने वाले दैनिक वेतनभोगियों का भविष्य केवल आश्वासनों के भरोसे रहेगा? क्या चुनाव के समय किए गए वादों की जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए? क्या सरकारी व्यवस्था को वर्षों तक अपनी सेवाएं देने वाले कर्मचारियों को रोजगार की सुरक्षा और सम्मानजनक भविष्य नहीं मिलना चाहिए?
दीपावली पर हर घर में दीप जलने की कामना की जाती है। ऐसे में जिन कर्मचारियों ने वर्षों तक सरकारी व्यवस्था में योगदान दिया, उनके घरों में बेरोजगारी और अनिश्चितता का अंधेरा क्यों? नियमितीकरण का वादा अब केवल घोषणा बनकर न रह जाए, इसके लिए सरकार को कर्मचारियों के हित में ठोस और संवेदनशील निर्णय लेने की जरूरत है।

