सुर्खियों में लापरवाह तंत्र..वन विभाग की अहाता तोड़कर बनी दुकानें, प्रशासन कठघरे में

0

 

सुर्खियों में लापरवाह तंत्र..वन विभाग की अहाता तोड़कर बनी दुकानें, प्रशासन कठघरे में



उत्तम साहू 

नगरी/ सांकरा। सोंढूर रोड स्थित नंदी चौक के पास वन विभाग की भूमि पर जो कुछ हो रहा है, वह केवल अतिक्रमण नहीं बल्कि सरकारी तंत्र की खुली हार की कहानी बन चुका है। जिस जमीन की सुरक्षा की जिम्मेदारी वन विभाग पर थी, उसी के अहाते को तोड़कर प्रभावशाली लोगों ने पक्की दुकानें खड़ी कर दीं, और विभाग देखता रह गया।

हैरानी की बात यह है कि यह सब चोरी-छिपे नहीं, बल्कि खुलेआम हुआ। वन परिक्षेत्र कार्यालय की मजबूत दीवार को तोड़ा गया, सरकारी सीमा मिटाई गई और देखते ही देखते शासकीय भूमि एक छोटे बाजार में तब्दील हो गई। सवाल यह नहीं कि अतिक्रमण कैसे हुआ, असली सवाल यह है कि वन विभाग और राजस्व विभाग उस वक्त क्या कर रहे थे?

स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि इस अतिक्रमण की शिकायतें कई बार की गईं, लेकिन हर बार वही घिसा-पिटा जवाब मिला “नोटिस जारी कर दिया गया है।” ग्रामीणों का आरोप है कि यही तथाकथित नोटिस संस्कृति अतिक्रमणकारियों के लिए सुरक्षा कवच बन गई, जिससे उनके हौसले और बुलंद होते चले गए।

एक समय यहां वन विभाग का अहाता और दीवार साफ नजर आती थी, लेकिन अब उसी जगह पर पक्की दुकानों की कतार खड़ी है। यह नजारा प्रशासन की कार्यशैली पर सीधा तमाचा है।

ग्रामीणों में गुस्सा इस बात को लेकर है कि वन विभाग और पंचायत, दोनों को निर्माण की पूरी जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई के नाम पर सिर्फ फाइलें आगे-पीछे की जा रही हैं। एक ग्रामीण ने तीखे शब्दों में कहा,
“जब विभाग अपनी जमीन की रखवाली नहीं कर सकता, तो जंगल बचाने की बातें सिर्फ दिखावा हैं।”

मामले को और गंभीर बनाती हैं वे चर्चाएं, जिनमें कथित लेन-देन की बात सामने आ रही है। सूत्रों के अनुसार दुकानों को न ढहाने के बदले मोटी रकम वसूले जाने की चर्चा है। हालांकि विभाग की ओर से न तो कोई खंडन आया है और न ही स्थिति स्पष्ट करने की जहमत उठाई गई है। यह चुप्पी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है।

अब जनता पूछ रही है
क्या वन विभाग की भूमिका सिर्फ नोटिस थमाने तक सीमित है? क्या यह मिलीभगत का मामला है या फिर सिस्टम की घोर नाकामी?

ग्रामीणों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय जांच कर न केवल अतिक्रमणकारियों पर, बल्कि जिम्मेदार अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई हो। उनका कहना है कि यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो शासकीय वन भूमि यूं ही गायब होती रहेगी और यह लापरवाही दूसरों के लिए नजीर बन जाएगी।

यह मामला केवल सांकरा का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां सरकारी जमीन सबसे असुरक्षित है और जिम्मेदार सबसे ज्यादा निश्चिंत।

जबकि पटवारी पंचनामा में सभी अतिक्रमणकारियों का नाम उल्लेख होने के बाद भी कार्यवाही नहीं होने से सिस्टम पर कई सवाल खड़े हो रहा है।



Post a Comment

0Comments

Please Select Embedded Mode To show the Comment System.*

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !