बस्तर में शांति के बाद विकास की असली लड़ाई अहिंसा या कॉरपोरेट वर्चस्व?..अमित जोगी

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बस्तर में शांति के बाद विकास की असली लड़ाई अहिंसा या कॉरपोरेट वर्चस्व?..अमित जोगी 

नक्सल का अंत: बंदूकें चुप, पर लालच की गूंज अब भी



उत्तम साहू 

रायपुर/ घने जंगल, कलकल बहती नदियां और ढोल-मांदर की थाप यही बस्तर की पहचान रही है। सदियों से आदिवासी समाज ने मिट्टी, जंगल और जल के साथ सहजीवन निभाया। फिर एक दौर आया जब बंदूकें गूंजीं, गांव उजड़े, स्कूल सूने हुए नक्सलवाद का साया छा गया। आज तस्वीर बदली है। बंदूकें लगभग चुप हैं। केंद्र सरकार का दावा है कि 2026 तक भारत नक्सल-मुक्त होगा और कभी आंदोलन का केंद्र रहा बस्तर अब महज तीन जिलों तक सिमट गया है।

लेकिन असली सवाल यह है बंदूकें क्यों चुप हुईं? क्या यह संवाद और समावेशी विकास की जीत है? या किसी और ताकत ने मैदान मारा?

         बंदूकें चुप, पर कारण अलग

यह शांति गांधीवादी अहिंसा की स्वाभाविक विजय नहीं है। नक्सलवाद इसलिए पीछे हटा क्योंकि अनियंत्रित पूंजीवाद आगे बढ़ा। कॉरपोरेटीकरण और निजीकरण के नाम पर संसाधनों की दौड़ ने हिंसा को दबाया लेकिन इसके बदले लूट का नया दौर शुरू हो गया।

बस्तर: जंगल का दिल, विकास का निशाना

इंद्रावती बस्तर की जीवनरेखा है। मारिया, मुरिया, गोंड और हल्बा समुदाय सदियों से इसके रक्षक रहे हैं। इतिहास गवाह है 1795 का भोपालपटनम विद्रोह, 1910 का भूमकाल आंदोलन, 1966 में महाराजा प्रवीर चंद्र भंज देव की हत्या ये सब एकता और आत्मसम्मान की मिसालें हैं।


आज वही एकता विकास परियोजनाओं की आड़ में टूट रही है—सड़कें, रेल और पाइपलाइनें बन रही हैं, पर आदिवासी अधिकार कुचले जा रहे हैं। यह दृश्य अमेरिका के ‘वाइल्ड वेस्ट’ की याद दिलाता है, जहां ‘प्रगति’ के नाम पर मूल निवासियों का विनाश हुआ। इतिहास बस्तर में खुद को दोहराने न पाए यही चेतावनी है।

गांधीवादी राह: अनुभव से निकला निष्कर्ष

2010 में बस्तर सत्याग्रह के जरिए अहिंसक पदयात्रा, गांव-गांव संवाद और शांतिपूर्ण विरोध का प्रयास हुआ। सलवा जुडुम का विरोध किया गया, जिसे 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक ठहराया। 2016 में पोलावरम बांध की ऊंचाई बढ़ाने के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित हुआ। इंद्रावती के जल बंटवारे और जोरा नाला संरचना पर लगातार संघर्ष हुआ। मूल सिद्धांत एक ही रहा—सामूहिक स्वामित्व और सद्भाव से ही टिकाऊ विकास संभव है।

PSU बनाम निजीकरण: दो मॉडल, दो नतीजे

लोहांडीगुड़ा में निजी स्टील प्लांट का विरोध हुआ और परियोजना रद्द हुई। दिलमिली में अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट की घोषणा के बावजूद काम आगे नहीं बढ़ सका। इसके उलट, नगरनार में सार्वजनिक क्षेत्र (PSU) के तहत स्थापित स्टील प्लांट सफल रहा।

सबक साफ है: आदिवासी समाज निजी कॉरपोरेट्स पर भरोसा नहीं करता। सार्वजनिक क्षेत्र का जनादेश संविधान के अनुच्छेद 39(बी) के तहत सामान्य हित है। बस्तर का विकास PSU-केंद्रित होना चाहिए उद्योग, IIT, AIIMS जैसे संस्थान इसी मॉडल से आएं।

    लूट का नया अध्याय

नक्सलवाद के जाने के बाद कॉरपोरेटीकरण तेजी से बढ़ा। खनन पट्टों, पाइपलाइनों और निजीकरण के फैसलों ने चिंता बढ़ाई। सिंचाई परियोजनाएं दशकों से लंबित हैं। बोधघाट, तिरिया जैसी योजनाएं आज भी सवाल पूछती हैं—विकास किसके लिए?

बस्तर का रोडमैप: मांग नहीं, हक बस्तर को पटरी पर लाने के लिए ठोस एजेंडा जरूरी है:

  • जगदलपुर को उप-राजधानी का दर्जा
  • उच्च न्यायालय की खंडपीठ
  • IIT और AIIMS
  • कुम्हारी–केशकाल–कोंडागांव–कोंटा रेलवे लाइन
  • पोलावरम से प्रभावित परिवारों का संरक्षण
  • NMDC मुख्यालय जगदलपुर में
  • स्थानीय रोजगार कानून
  • इंद्रावती–जोरा नाला संरचना
  • बोधघाट सहित लंबित सिंचाई परियोजनाओं की शुरुआत

यह सब PSU-केंद्रित विकास से संभव है, न कि बेलगाम पूंजीवाद से।

राम राज्य, सहिष्णुता और एकता

गांधीजी का राम राज्य किसी एक धर्म का राज्य नहीं था। वह समान अधिकार, सहिष्णुता और न्याय का प्रतीक था। आज अगर गांवों में आस्था के नाम पर विभाजन बढ़ेगा, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ होगा। PESA कानून ग्राम सभा को संसाधनों पर अधिकार देता है, आस्था पर नहीं। असली रोक कॉरपोरेट लूट पर लगनी चाहिए।

      अंतिम बात

नक्सल-मुक्त बस्तर की एकमात्र शर्त है हमारी एकता।
अगर एकता टूटी, तो न जंगल बचेंगे, न जल, न जमीन। और तब बंदूकें भले चुप रहें लालच की गूंज सब कुछ निगल जाएगी।


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