रेप केस में डॉक्टर को हाईकोर्ट से राहत नहीं, FIR रद्द करने की मांग नामंज़ूर
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बलात्कार के आरोपों का सामना कर रहे एक डॉक्टर को बड़ी राहत देने से इंकार कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि ऐसे गंभीर मामलों में शुरुआती स्तर पर हस्तक्षेप केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
मामला महाराष्ट्र के लातूर निवासी डॉ. विजय उमाकांत वाघमारे (33) से जुड़ा है, जो एमएस ऑर्थोपेडिक सर्जन हैं। उनके खिलाफ वर्ष 2018 में दुर्ग जिले के भिलाई नगर थाने में मामला दर्ज किया गया था। आरोप है कि डॉक्टर ने विवाह का भरोसा दिलाकर पीड़िता के साथ दो बार शारीरिक संबंध बनाए।
जांच पूरी होने के बाद 3 अक्टूबर 2025 को पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया, जिस पर दुर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने संज्ञान लिया। इस पूरे आपराधिक प्रकरण को रद्द कराने के लिए आरोपी डॉक्टर ने हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था।
डॉक्टर की ओर से दलील दी गई कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया है। घटना के कथित समय वे पुणे के ससून जनरल अस्पताल में रेजिडेंट डॉक्टर थे और अस्पताल का उपस्थिति रजिस्टर उनकी नियमित ड्यूटी दर्शाता है। ऐसे में मार्च 2017 में भिलाई में मौजूद होना असंभव बताया गया। इसके अलावा एफआईआर दर्ज होने में 19 महीने की देरी, आपसी सहमति और शादी के लिए दबाव जैसे तर्क भी रखे गए।
वहीं, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि आरोपी द्वारा उठाए गए सभी बिंदु तथ्यात्मक हैं, जिनका निर्णय केवल ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है। बलात्कार जैसे मामलों में केवल देरी के आधार पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि इस चरण पर सबूतों की जांच या मिनी ट्रायल संभव नहीं है। एलिबाई, सहमति, देरी और झूठे फंसाए जाने जैसे मुद्दे विचारण का विषय हैं।
अदालत ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड से प्रथम दृष्टया अपराध का संकेत मिलता है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आरोपी को ट्रायल कोर्ट में अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा।

