19,300 रुपये के लिए कब्र से बहन का कंकाल उठाकर बैंक पहुंचा भाई, व्यवस्था पर भारी पड़ा दर्द
ओडिशा के पटना ब्लॉक के मल्लीपासि इलाके में सोमवार का दिन किसी आम दिन जैसा नहीं था। वहां एक भाई अपने कंधों पर सिर्फ कपड़े में लिपटा कंकाल नहीं, बल्कि बेबसी, गरीबी और टूटी उम्मीदों का बोझ उठाकर बैंक पहुंचा था।
डियानाली गांव का जीतू मुंडा…जिसकी दुनिया पहले ही उजड़ चुकी थी। बहन कालरा मुंडा दो महीने पहले इस दुनिया से चली गई थी। उसका पति और इकलौता बच्चा भी पहले ही दम तोड़ चुके थे। पीछे बचा था तो सिर्फ जीतू… और उसकी बहन की कुछ यादें, और बैंक खाते में पड़े 19,300 रुपये।
जब जीतू पहली बार बैंक पहुंचा, तो उससे कागज़ मांगे गए—डेथ सर्टिफिकेट, वारिस का प्रमाण…लेकिन उसके पास न पढ़ाई थी, न समझ, न कोई दस्तावेज। वह चुपचाप लौट गया… शायद यह सोचकर कि अब क्या करे। फिर आया वो दिन… जिसने इंसानियत को आईना दिखा दिया।
जीतू अपनी बहन की कब्र पर गया…मिट्टी हटाई… और बहन के अवशेषों को कपड़े में बांध लिया।करीब 3 किलोमीटर पैदल चला…और बैंक के दरवाजे पर खड़ा हो गया।उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन शब्द नहीं।
शायद वह कहना चाहता था—"ये रहा सबूत… अब तो दे दो मेरी बहन के पैसे…!"
यह दृश्य देखकर वहां मौजूद लोग सन्न रह गए। कुछ की आंखें भर आईं… कुछ के मन में सवाल उठे—क्या कागज़ इंसानियत से बड़ा हो गया है?
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची। जीतू को समझाया गया, भरोसा दिलाया गया कि उसकी मदद होगी। अधिकारियों ने भी मामले को संवेदनशीलता से देखने की बात कही है।
यह कहानी सिर्फ जीतू की नहीं है…
यह उन लाखों लोगों की कहानी है जो सिस्टम की जटिलताओं में फंसकर अपनी संवेदनाएं खो बैठते हैं। कभी-कभी लगता है…
कागज़ों की दुनिया में, इंसान कहीं पीछे छूट गया है।

