संपादकीय: सच्चाई को दबाने वाला तंत्र — शिक्षा विभाग सवालों के घेरे में
उत्तम साहू
शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबों का ज्ञान देना नहीं, बल्कि बच्चों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति से शुरू होता है। मगर धमतरी जिले की नवीन प्राथमिक शाला नारी की घटना ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे शिक्षा तंत्र की प्राथमिकताएँ अब उलट चुकी हैं?
यहां सहायक शिक्षक ढालूराम साहू को इसलिए निलंबित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने अपने विद्यार्थियों के लिए आवाज उठाई थी — उन विद्यार्थियों के लिए जिन्हें आज भी किताबें नसीब नहीं हैं। चौथी कक्षा के 21 बच्चों के लिए हिंदी की नई किताबें उपलब्ध नहीं हैं, और जो कुछ किताबें हैं, वे भी पुरानी और अपर्याप्त। कुछ बच्चे किताब के अभाव में पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हैं। यह दृश्य उस देश का है जो “सबको शिक्षा” की बातें करता है।
विडंबना यह है कि जब एक शिक्षक ने इस वास्तविकता को उजागर किया, तो विभाग ने कार्रवाई की सुधार पर नहीं, बल्कि सवाल उठाने वाले पर। विभाग ने शिक्षक के व्हाट्सऐप स्टेटस को "शिक्षकीय गरिमा के विपरीत" बताया। पर सवाल यह है कि गरिमा किसमें है सच्चाई को छिपाने में या बच्चों की जरूरतों की पूर्ति में?
ढालूराम साहू ने जो लिखा, वह एक जिम्मेदार शिक्षक की पीड़ा थी:
“जब तक बच्चों को किताबें नहीं मिलेंगी, तब तक सभी जिम्मेदारों का वेतन रोक देना चाहिए।”
क्या यह कथन अनुशासनहीनता है या संवेदनशीलता की अभिव्यक्ति?
प्रशासनिक तंत्र अब आलोचना से असहज हो चुका है। यह जनता की शिकायतों और शिक्षकों की चिंताओं को सुधार का अवसर मानने के बजाय उसे ‘विरोध’ के रूप में देखने लगा है। यही कारण है कि स्कूलों में किताबों की कमी जैसी मूलभूत समस्याएँ वर्षों से जस की तस बनी हुई हैं।
अगर सच्चाई कहने पर शिक्षक निलंबित होंगे, तो व्यवस्था में सुधार की उम्मीद कौन करेगा? विभाग को यह समझना होगा कि आवाज उठाना अपराध नहीं, बल्कि सुधार की पहली शर्त है।
बच्चों की शिक्षा को सुधारने की जिम्मेदारी केवल समारोहों और अभियानों से पूरी नहीं होगी। इसके लिए जमीनी काम, पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है। ढालूराम साहू जैसे शिक्षकों की आवाज दबाकर नहीं, बल्कि उन्हें सुनकर ही शिक्षा तंत्र की साख बचेगी।
क्योंकि जब सच्चाई पर ताले लगते हैं, तब सबसे पहले शिक्षा हारती है और उसके साथ हारता है हर वह बच्चा, जो उजाले का हकदार है।

