धमतरी जिले में राजस्व अधिकारियों की लापरवाही: धारा 89 और 115 की अनदेखी, क्या जानबूझकर की गई है साजिश..?
मामला..धमतरी,मगरलोड,और नगरी का
उत्तम साहू
धमतरी/ नगरी- 21 दिसंबर 2025: छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। डिजिटल युग में जहां सभी कार्य ऑनलाइन और ई-कोर्ट के माध्यम से होने का दावा किया जाता है, वहां आम नागरिकों को भूमि संबंधी न्याय के लिए अभी भी तहसीलदार और अनुविभागीय कार्यालयों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। लेकिन असली समस्या यह है कि राजस्व अधिकारियों द्वारा भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 89 (बंदोबस्त त्रुटि सुधार) और धारा 115 (सामान्य त्रुटि सुधार) की बुनियादी समझ ही नहीं है, या फिर जानबूझकर इनका दुरुपयोग किया जा रहा है। जिले के विभिन्न तहसीलों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां तहसीलदारों और राजस्व निरीक्षकों ने गलत धाराओं के तहत आदेश पारित किए, जिससे न केवल न्याय की प्रक्रिया प्रभावित हुई बल्कि आम आदमी की विश्वास की नींव हिल गई। क्या यह अक्षमता है या साजिश की सुनियोजित जड़ें? यह सवाल अब जिले के प्रशासनिक मुखिया से पूछा जा रहा है।
नगरी तहसील का मामला इस समस्या की जड़ को उजागर करता है। यहां आवेदक राजकुमार, पिता हरिकलाल, निवासी पुरानी बस्ती नगरी ने अपनी भूमि खसरा नंबर 2217, रकबा 0.14 हेक्टेयर के स्थान पर त्रुटिवश 0.04 हेक्टेयर दर्ज होने की तहसील न्यायालय में आवेदन पेश किया। उन्होंने बंदोबस्त पूर्व अभिलेख, राजस्व सर्वेक्षण अभिलेख और चालू अभिलेख प्रस्तुत किए। तत्कालीन तहसीलदार श्री ध्रुव ने इसे बंदोबस्त त्रुटि मानते हुए धारा 89 के तहत प्रकरण दर्ज किया और राजस्व निरीक्षक श्री ध्रुव से जांच प्रतिवेदन मांगा। निरीक्षक ने रिपोर्ट में कहा कि वर्ष 2003-04 से 2012-13 तक के खसरा पांचसाला में रकबा 0.14 हेक्टेयर आवेदक के पिता हरीकराम के नाम पर दर्ज है, जिसका मतलब त्रुटि बंदोबस्त के बाद हुई। लेकिन यह स्पष्ट रूप से सामान्य त्रुटि का मामला था, क्योंकि बंदोबस्त त्रुटि केवल प्रारंभिक बंदोबस्त के दौरान की गलतियों से संबंधित होती है, न कि बाद की एंट्री में। फिर भी तहसीलदार ने धारा 89 के तहत आदेश पारित कर दिया। यह न केवल कानूनी अज्ञानता दर्शाता है बल्कि संभावित रूप से जानबूझकर की गई लापरवाही को इंगित करता है, जिससे आवेदक को अनुचित लाभ मिल सकता है या अन्य पक्ष प्रभावित हो सकते हैं।
इसी प्रकार, धमतरी तहसील के ग्राम दोनर में आवेदक जैनेन्द्र शर्मा, पिता ररूहा उर्फ गंगाप्रसाद शर्मा ने अपनी भूमि खसरा नंबर 2532/1 और 2532/2, रकबा 0.09 और 0.10 हेक्टेयर के मामले में त्रुटि होने का आवेदन तहसील में पेश किया। वर्तमान में यह भूमि अन्य दो व्यक्तियों के नाम पर दर्ज थी। उन्होंने आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत किए, और तत्कालीन तहसीलदार श्री देशलहरे ने इसे धारा 89 के तहत दर्ज किया। राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट में राजस्व सर्वेक्षण मिसल अभिलेख वर्ष 1993-94 का हवाला दिया गया, जहां मूल खसरा 2532, रकबा 0.19 हेक्टेयर आवेदक के पिता के नाम पर दर्ज था। तत्कालीन तहसीलदार श्री देशलहरे द्वारा धारा 89 के तहत आदेश पारित किया। यह स्पष्ट है कि धारा 115 के तहत सामान्य सुधार की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी, लेकिन अधिकारियों की इस लापरवाही से क्या छिपाया जा रहा है? क्या यह भूमि हड़पने या अनुचित लाभ के लिए किया गया खेल है? स्थानीय निवासियों का कहना है कि ऐसे मामलों में पटवारियों और निरीक्षकों की मिलीभगत से अभिलेखों में हेरफेर होता है, और तहसीलदार बिना गहन जांच के हस्ताक्षर कर देते हैं।
मगरलोड तहसील के ग्राम झाझरकेरा का मामला और भी चौंकाने वाला है। आवेदक विमल पिता रिखीराम गोंड ने अपनी भूमि खसरा नंबर 1287/1 और 1287/2, रकबा 1.00 और 0.42 हेक्टेयर के मामले में आवेदन प्रस्तुत किया कि वर्तमान में खसरा 1287/2 झगलूराम के नाम पर दर्ज है। अभिलेख प्रस्तुत करने पर तहसीलदार श्री भारद्वाज ने धारा 89 के तहत प्रकरण दर्ज किया और राजस्व निरीक्षक मेघा श्री ठाकुर से रिपोर्ट मांगी। रिपोर्ट में खसरा पांचसाला वर्ष 2003-04 का जिक्र करते हुए कहा गया कि मूल खसरा 1287, रकबा 1.42 हेक्टेयर आवेदक के पिता के नाम पर है। फिर भी धारा 89 के तहत आदेश पारित हुआ। यह पैटर्न जिले भर में देखा जा रहा है, जहां राजस्व निरीक्षक, जो पटवारी पद से पदोन्नत होकर आते हैं और जिन्हें विभागीय प्रशिक्षण और परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है, बुनियादी अंतर नहीं समझ पा रहे। पटवारी बनने के लिए एक वर्ष का प्रशिक्षण, विभागीय परीक्षा, फिर कम से कम पांच वर्ष का अनुभव, और उसके बाद राजस्व निरीक्षक के लिए एक और वर्ष का प्रशिक्षण – इतनी तैयारी के बाद भी ऐसी गलतियां? यह अक्षमता नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई चूक लगती है, जो न्यायालय को गुमराह करती है। कोई भी निरीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में यह नहीं लिखा कि मामला सामान्य त्रुटि का है, जिससे सवाल उठता है कि क्या इसमें आर्थिक लाभ या दबाव शामिल है?
ये मामले केवल हिमशैल की नोक हैं। जिले में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहां आवेदकों को राहत मिली, लेकिन गलत धाराओं के तहत। भू-राजस्व संहिता की धारा 89 बंदोबस्त के दौरान की त्रुटियों के लिए है, जो प्रारंभिक सर्वेक्षण से जुड़ी होती हैं, जबकि धारा 115 बाद की सामान्य त्रुटियों के लिए, जैसे एंट्री में गलती इत्यादि। लेकिन अधिकारियों की अनदेखी से आम आदमी प्रभावित हो रहा है। तहसीलदार, जो नायब तहसीलदार से पदोन्नत होते हैं और जिन्हें शासन द्वारा समय-समय पर न्यायालयी प्रशिक्षण दिया जाता है, वे भी प्रकरण की प्रकृति समझने में विफल रहे। इससे राजस्व न्यायालयों की विश्वसनीयता पर सवाल उठता है। क्या यह प्रशिक्षण महज औपचारिकता है? या फिर भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी हैं कि अधिकारी जानबूझकर गलत आदेश पारित कर रहे हैं?
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं और किसानों का कहना है कि ऐसे मामलों से भूमि विवाद बढ़ रहे हैं, और गरीब किसान न्याय के लिए भटक रहे हैं। एक किसान ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "पटवारी से लेकर तहसीलदार तक सब मिले हुए हैं। छोटी-मोटी रिश्वत में अभिलेख बदल दिए जाते हैं, और गलत धारा लगाकर काम निकाल लिया जाता है।"
यह स्थिति जिले के प्रशासन पर कलंक है। अब सवाल जिले के मुखिया से है – क्या वे इस पर ध्यान देंगे.? क्या किसी राजस्व निरीक्षक को उनके मूल पद पटवारी पद पर डिमोट करके उदाहरण प्रस्तुत करेंगे? यदि नहीं, तो यह साबित होगा कि प्रशासन में ऊपर से नीचे तक लापरवाही बरती जा रही है।
यह मामला केवल धमतरी तक सीमित नहीं; पूरे राज्य में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई, तो आम आदमी का न्याय व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा। क्या सरकार इस पर संज्ञान लेगी, या यह भी फाइलों में दब जाएगा? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल धमतरी जिले की राजस्व व्यवस्था नकारात्मकता की चपेट में है, जहां अक्षमता और संभावित भ्रष्टाचार का बोलबाला है। टीप उक्त दिए गए नाम पता काल्पनिक मात्र इनका वास्तविक घटनाओं से कोई लेना देना नहीं है केवल उदाहरण मात्र है

