नगरी..खेतों में जलाए जा रहे पराली के धुआँ से आबो हवा दुषित
प्रशासन मौन,गौठान बंद, जागरूकता गायब, किसानों में नाराजगी
उत्तम साहू दिनांक 4.12.2025
नगरी अंचल इन दिनों धुएँ की चादर में लिपटा है। खेतों में पराली जलने की घटनाएँ इतनी बढ़ गई हैं कि गाँवों की हवा तक भारी हो चली है। सड़क किनारे उठते काले गुबार, चुभती बदबू और हर तरफ फैलता प्रदूषण… लेकिन हाल-चाल पूछने वाला प्रशासन कहीं नजर नहीं आ रहा।
फसल कटाई-मड़ाई लगभग समाप्त हो चुकी है और किसान रबी की तैयारी में जुटे हैं। हार्वेस्टर से कटाई के बाद बची पराली को निपटाने का सबसे आसान रास्ता आग..अब गाँवों में आम दृश्य बन चुका है। फरसिया, अमाली, साकरा, उमरगांव, गढ़डोंगरी, बेलर, भुरसीडोंगरी, घोटगांव से लेकर डोगरडुला तक दर्जनों स्थानों पर खेतों और सड़क किनारे धधकती पराली प्रशासन की लापरवाही की गवाही दे रही है।
गौठान गतिविधियाँ ठप..पैरा दान की परंपरा समाप्त, भूसा अब खेतों में जल रहा
पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के समय गौठान सक्रिय थे, पशुओं के लिए चारा व्यवस्था चलती थी और किसान बड़ी मात्रा में पैरा दान करते थे। इससे खेतों में पराली जलाने की घटनाएँ स्वाभाविक रूप से कम थीं।
परंतु वर्तमान भाजपा शासन में गौठान गतिविधियाँ लगभग ठप पड़ जाने से पैरा दान की परंपरा भी टूट गई है। किसानों के पास न तो निपटान का बेहतर विकल्प है और न ही प्रशासन योजना लेकर सामने आया—नतीजा: खेतों में धधकती आग।
विभागीय उदासीनता पर ग्रामीणों के सवाल..‘कहाँ है कृषि विभाग?’
कागज़ों में भले ही पराली प्रबंधन, कम्पोस्ट, मल्चर, अवशेष आधारित खाद और पशु आहार जैसी योजनाएँ चल रही हों, लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को कोई मार्गदर्शन तक नहीं दिया गया।
न तो कृषि विभाग ने गांव-गांव जागरूकता चलाई और न पंचायतों को किसी प्रकार का निर्देश जारी हुआ।
जनपद सदस्य प्रमोद कुंजाम का स्पष्ट आरोप
“गौठान बंद हैं, पैरा दान रुक गया है, और प्रशासन किसानों को रोकना तो दूर, जानकारी तक नहीं दे रहा। इसलिए पराली जलाना मजबूरी बन गई है।”
किसानों की सफाई..“समय नहीं, साधन नहीं… तो क्या करें?”
किसानों का कहना है कि समयाभाव और रबी फसल की तैयारी के चलते पराली जलानी पड़ रही है।
यदि प्रशासन मल्चर, कम्पोस्ट यूनिट, पैरा संग्रहण आदि की व्यवस्था करता, तो आग लगाने की नौबत नहीं आती।
प्रशासन का जवाब..“राजस्व देखेगा कार्रवाई”
कृषि विभाग से जब जानकारी ली गई तो जिम्मेदारी दूसरों पर डाल दी गई। विभागीय अधिकारी का कहना था—
“पराली जलाने की शिकायतें मिली हैं… कार्रवाई राजस्व विभाग करता है।”
अर्थात् ना रोकथाम, न जागरूकता, न वैकल्पिक व्यवस्था—सिर्फ जिम्मेदारी पास-ओवर।
प्रदूषण बढ़ा, सड़कें धुंधली—लेकिन कार्रवाई शून्य
धुएँ से लोगों को सांस लेने में दिक्कत, बच्चों और वृद्धों को परेशानी, सड़क पर वाहन चालकों को कम दृश्यता की समस्या… लेकिन किसी विभाग की टीम अब तक किसी गांव में नहीं पहुँची।
ग्रामीणों का सवाल बेहद सीधा है..“जब सरकार गौठान बंद कर दे, कृषि विभाग जागरूकता न चलाए और राजस्व विभाग सिर्फ नोटिस दिखाए—तो पराली कौन रोकेगा?”
प्रदूषण बढ़ने, नीति विफल होने और विभागीय उदासीनता के बीच नगरी अंचल इन दिनों उसी पराली में घिरा हुआ है, जिसे रोकना प्रशासन का प्राथमिक कर्तव्य था, पर जिसे जलते देखने का विकल्प उसने चुन लिया।


