तुता धरना स्थल बना कब्रिस्तान! दो रसोइयों की मौत के बाद भी सरकार बेखबर
रायपुर। नवा रायपुर का तुता धरना स्थल अब प्रदर्शन स्थल नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का प्रतीक बन चुका है। मिड-डे मील योजना से जुड़ी महिला रसोइयों की अनिश्चितकालीन हड़ताल के दौरान दो महिलाओं की मौत हो चुकी है, फिर भी सरकार और प्रशासन की नींद नहीं टूटी है। सवाल यह है—क्या अब भी किसी और लाश का इंतज़ार किया जा रहा है?
ठंड, गंदगी और बदइंतज़ामी के बीच खुले आसमान के नीचे बैठी ये महिलाएं अपने हक़ की लड़ाई लड़ रही हैं। लेकिन बदले में उन्हें मिला है—बीमारी, संक्रमण और मौत। धरने के दौरान दुलारी यादव और रुक्मणी सिन्हा की जान चली गई। दोनों महिलाएं सर्दी, खांसी, तेज सिरदर्द और संक्रमण से जूझ रही थीं। इलाज के नाम पर सिर्फ अस्पताल का रास्ता दिखाया गया, जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली।
धरना स्थल पर हालात अमानवीय हैं। न साफ पानी, न शौचालय, न नहाने की व्यवस्था, न तंबू, न कंबल। छोटे-छोटे बच्चों के साथ महिलाएं ठिठुरती रातें काटने को मजबूर हैं। यह 21वीं सदी का छत्तीसगढ़ है या किसी युद्धग्रस्त इलाके की तस्वीर?
रसोइया संघ का आरोप है कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद प्रशासन ने कोई ठोस व्यवस्था नहीं की। महिलाओं ने साफ शब्दों में कहा है,“दो लाशें जा चुकी हैं, आगे और भी जाएंगी, लेकिन जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं, हम यहां से नहीं हटेंगे।”
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिन महिलाओं के कंधों पर सरकारी स्कूलों के बच्चों का पोषण टिका है, उनकी खुद की जिंदगी की कीमत क्या इतनी सस्ती है?
अगर अब भी सरकार नहीं चेती, तो तुता धरना स्थल इतिहास में हक़ की नहीं, सिस्टम की नाकामी की कब्रगाह के रूप में याद किया जाएगा।

