इंद्रावती की लहरों में बुझ गया एक घर का चिराग
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में इंद्रावती नदी एक बार फिर इंसानों की बेबसी की गवाह बनी। 21 जनवरी 2026 की शाम, जब बाजार से लौटते कदम घर की दहलीज की ओर बढ़ रहे थे, तब किसे पता था कि नदी रास्ता नहीं, मौत बन जाएगी।
भैरमगढ़ तहसील के उसपरी घाट पर रोज़ की तरह एक डोंगी नदी पार कर रही थी। नाव में सवार लोग साप्ताहिक बाजार से सामान लेकर अपने गांव बोड़गा लौट रहे थे। लेकिन इंद्रावती उस दिन उफान पर थी। जैसे ही नाव बीच धार में पहुंची, तेज बहाव ने संतुलन छीना और पलक झपकते ही डोंगी पलट गई।
कुछ ही सेकंड में खुशियों की बातें चीखों में बदल गईं। पानी में हाथ-पांव मारते लोग मदद की गुहार लगाते रहे। गांव वालों ने जान जोखिम में डालकर दो लोगों को बचा लिया, लेकिन एक पूरा परिवार—पति, पत्नी और उनके दो मासूम बच्चे—इंद्रावती की आगोश में समा गया। कहीं दो महिलाओं और दो बच्चों के लापता होने की बात सामने आई, तो कहीं पूरे परिवार के उजड़ने की।
अंधेरा उतरते ही नदी किनारे मातम पसर गया। टॉर्च की रोशनी, टूटती आवाज़ें और अपनों को पुकारती आंखें… मगर नदी ने कोई जवाब नहीं दिया। रात भर इंतज़ार चलता रहा, उम्मीद हर लहर के साथ टूटती रही।
सुबह होते ही प्रशासन हरकत में आया। SDRF, राजस्व विभाग और स्थानीय टीमों ने मोटरबोट के साथ सर्च ऑपरेशन शुरू किया। लेकिन नक्सल प्रभावित और दुर्गम इलाका राहत कार्यों को और कठिन बना रहा है।
यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस मजबूरी की तस्वीर है, जहां सुरक्षित पुल और साधनों के अभाव में लोग रोज़ अपनी जान जोखिम में डालते हैं। इंद्रावती यहां जीवन की रेखा है, लेकिन कभी-कभी वही रेखा सबसे गहरा ज़ख्म दे जाती है।
फिलहाल चारों लापता लोगों का कोई पता नहीं है। गांव खामोश है, और हर नज़र उसी नदी पर टिकी है—शायद इंद्रावती आज कुछ लौटा दे।

