विधानसभा में विधायक अंबिका मरकाम ने उठाया पारधी समुदाय का मुद्दा: 50 वर्ष पुराने दस्तावेजों की अनिवार्यता बनी शिक्षा और भविष्य में बाधा

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विधानसभा में विधायक अंबिका मरकाम ने उठाया पारधी समुदाय का मुद्दा: 

50 वर्ष पुराने दस्तावेजों की अनिवार्यता बनी शिक्षा और भविष्य में बाधा



उत्तम साहू 

रायपुर: छत्तीसगढ़ विधानसभा में आदिवासियों के जाति प्रमाण पत्र, विशेषकर पारधी समुदाय को होने वाली समस्याओं का मुद्दा गरमाया रहा। सिहावा विधायक श्रीमती अंबिका मरकाम ने ध्यानाकर्षण सूचना के माध्यम से सदन को बताया कि प्रदेश का पारधी समाज आज भी बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है।

शिक्षा और रोजगार से वंचित हो रही नई पीढ़ी

विधायक मरकाम ने सदन में चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पारधी समुदाय के बच्चों के सामने सबसे बड़ी बाधा प्रशासन द्वारा मांगे जाने वाले 50 वर्षों के शासकीय दस्तावेज हैं।

दस्तावेजों के अभाव में अधिकांश बच्चे आठवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं।

माध्यमिक शिक्षा पूरी करने वाले युवाओं को भी जाति प्रमाण पत्र न होने के कारण सरकारी सेवाओं में अवसर नहीं मिल पा रहा है।

स्थानीय शिक्षकों के अनुसार, अकेले एक विद्यालय में पारधी समुदाय के लगभग 25 बच्चे अध्ययनरत हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।

क्षेत्रीय बंधन और नियमों की पेचीदगी

चर्चा के दौरान यह तथ्य सामने आया कि पारधी, बहेलिया, चिता पारधी और फांस पारधी जैसी जातियों को क्षेत्रीय बंधन (Area Restriction) के तहत अनुसूचित जनजाति अधिसूचित किया गया है।

राज्य शासन द्वारा मई 2008 में इस क्षेत्रीय बंधन को समाप्त करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा गया था।

भारत सरकार के जनजातीय कार्य मंत्रालय ने 29 फरवरी 2012 को इस प्रस्ताव को अमान्य कर दिया था।

सरकार का जवाब: "नियमों के दायरे में ही संभव"

आदिम जाति विकास मंत्री श्री रामविचार नेताम ने स्पष्ट किया कि जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया भारत सरकार की गाइडलाइन और अधिसूचित सूची पर आधारित है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अपनी ओर से सूची में बदलाव करने का अधिकार नहीं रखती है।

मंत्री जी ने आश्वासन दिया कि यदि समुदायों को अधिक दिक्कतें हो रही हैं, तो केंद्र सरकार को पुनः पत्र लिखकर निराकरण का निवेदन किया जाएगा।

अन्य समुदायों की गूंज

सदन में बिंद्रानवागढ़ विधायक श्री जनक ध्रुव ने भी 40-50 वर्षों से निवास कर रहे परिवारों के जाति प्रमाण पत्र का मुद्दा उठाया। वहीं, श्री कुंवर सिंह निषाद ने मछुआरा समाज (केवट, धीवर, कहार आदि) को मांझी समुदाय के अंतर्गत आरक्षण का लाभ न मिलने और विसंगतियों को दूर करने के लिए अशासकीय संकल्प का उल्लेख किया।


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