धमतरी जिले के राजस्व विभाग में पटवारी राज!
शासकीय पट्टेदार भूमि को बनाया निजी संपत्ति, नियम–कानून ताक पर
मामला नगरी तहसील के ग्राम बटनहर्रा का
उत्तम साहू
धमतरी/नगरी- धमतरी जिले के राजस्व विभाग में एक बार फिर कथित भ्रष्टाचार की बदबूदार तस्वीर सामने आई है। नगरी तहसील में पदस्थ एक पटवारी ने खुद को कानून से ऊपर समझते हुए शासकीय पट्टेदार भूमि को निजी खजाने में तब्दील कर दिया। मामला सामने आने के बाद राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक चुप्पी पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
चार एकड़ से अधिक शासकीय भूमि पर ‘डिजिटल खेल’
प्राप्त जानकारी के अनुसार नगरी तहसील के ग्राम बटनहर्रा स्थित खसरा नंबर 123 (रकबा 1.82 हेक्टेयर, लगभग 4 एकड़ 55 डिसमिल) भूमि राजस्व सर्वेक्षण मिसल अभिलेखों में स्पष्ट रूप से शासकीय पट्टेदार मद में दर्ज थी। यह वही भूमि होती है जिसे शासन गरीब और भूमिहीन किसानों को जीवन-यापन के लिए देता है—जिसे न तो बेचा जा सकता है और न ही कलेक्टर की अनुमति के बिना भूमिस्वामी में बदला जा सकता है।
यह प्रावधान छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता 1959 की धारा 181–182 में साफ दर्ज है।
अभिलेख सही, लेकिन नीयत गलत!
1986-87 के राजस्व सर्वे से लेकर 2014-15 तक के खसरा पंचशाला अभिलेख इस भूमि को शासकीय पट्टेदार ही बताते हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि खतौनी बी-1 (2009-10 से 2013-14) में इस भूमि को त्रुटिपूर्ण तरीके से ‘भूमिस्वामी’ दर्शा दिया गया।
खाताधारक की मृत्यु के बाद जब सह-खातेदार सुकालु आदि ने अपना नाम जुड़वाने के लिए तहसील न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया, तो प्रकरण की जांच हल्का पटवारी के.के. चंद्रवंशी को सौंपी गई।
जांच के नाम पर साठगांठ?
सूत्रों का आरोप है कि पटवारी ने दस्तावेजों की सही स्थिति जानते हुए भी न्यायालय को गुमराह करने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की।
आवेदन केवल सह-खातेदारों का नाम जोड़ने का था, लेकिन कथित रूप से रिश्वत लेकर पटवारी ने शासकीय पट्टेदार भूमि को भूमिस्वामी में बदलने की सिफारिश कर दी।
इतना ही नहीं—डिजिटल हस्ताक्षर कर रिकॉर्ड “दुरुस्त” कर दिए गए, ताकि आगे चलकर जमीन की खुलेआम खरीद–फरोख्त की जा सके।
एक किसान भटक रहा, दूसरा ‘सेटिंग’ से मालामाल!
यही नहीं, ग्राम भठेली के किसान संतलाल का मामला सिस्टम की दोहरी नीति उजागर करता है।
संतलाल को कलेक्टर की अनुमति के बाद भी आज तक भूमिस्वामी का दर्जा नहीं मिल पाया। अनुमति धारा 165(6) में दी गई, जबकि सही धारा 165(7ख) होनी चाहिए थी।
गलत धारा में रजिस्ट्री और नामांतरण तो हो गया, लेकिन सुधार के लिए किसान वर्षों से दफ्तरों के चक्कर काट रहा है।
इसके उलट बटनहर्रा में कथित तौर पर पटवारी को रिश्वत देकर पूरा सिस्टम मोड़ लिया गया।
प्रशासन मौन क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि
- क्या यह मामला जनदर्शन और विधायक के ध्यानाकर्षण के बाद भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया?
- क्या पटवारी के.के. चंद्रवंशी पर FIR और निलंबन जैसी कार्रवाई होगी?
- या फिर यह मामला भी राजस्व विभाग की कथित भ्रष्टाचार सूची में जुड़कर दम तोड़ देगा?
कानून सबके लिए एक या ‘सेटिंग’ वालों के लिए अलग?
यह मामला केवल एक जमीन का नहीं, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की साख का है।
अगर शासकीय पट्टेदार भूमि को यूं ही निजी संपत्ति बनाया जाएगा, तो गरीब किसानों के हक़ की रक्षा कौन करेगा?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं—कार्रवाई होगी या फिर चुप्पी ही जवाब बनेगी?

