इमरजेंसी पर ताला, सिस्टम बेपरवाह.. इलाज के इंतजार में बुझ गई जिंदगी, बोरई अस्पताल बना मौत का दरवाजा
उत्तम साहू
नगरी/ बोरई में स्वास्थ्य विभाग की कथित लापरवाही ने इंसानी जान की कीमत पर सरकारी दावों की पोल खोल दी। सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल युवक अस्पताल पहुंचा, लेकिन इलाज नहीं — सन्नाटा मिला। इमरजेंसी सेवा पर ताला, डॉक्टर गायब, स्टाफ नदारद… और तड़पते-तड़पते युवक ने दम तोड़ दिया।
यह मौत हादसे से कम और सिस्टम की नाकामी से ज्यादा बताई जा रही है।
घायल पहुंचा अस्पताल, पर अस्पताल में कर्मचारी “गायब” मिला
रविवार देर रात बोरई-घुटकेल मार्ग पर हादसे के बाद पुलिस और ग्रामीण घायल युवक को तत्काल सिविल अस्पताल बोरई लेकर पहुंचे। आरोप है कि वहां कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था, न ही मेडिकल स्टाफ।
गंभीर हालत में युवक इलाज के इंतजार में तड़पता रहा, लेकिन मदद नहीं मिली। ग्रामीणों का कहना है अगर समय पर प्राथमिक उपचार मिल जाता, तो शायद जान बच सकती थी।
मौत के बाद फूटा गुस्सा,शव रखकर पूरी रात घेराव
जैसे ही युवक की मौत की खबर फैली, गांव में आक्रोश भड़क उठा। नाराज ग्रामीणों ने शव अस्पताल के मुख्य द्वार पर रखकर पूरी रात धरना दिया।
अस्पताल परिसर नारेबाजी से गूंजता रहा
“डॉक्टर दो,जवाब दो”
“लापरवाह सिस्टम बंद करो”
हाईवे जाम — चेतावनी: अब आश्वासन नहीं, कार्रवाई चाहिए
गुस्साए लोगों ने स्टेट हाईवे पर चक्का जाम कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने साफ कहा “हर बार मौत के बाद जांच, हर बार आश्वासन… अब नहीं। जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई तो उग्र आंदोलन होगा।”
ग्रामीणों का आरोप है कि बोरई में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी कोई नई बात नहीं है। पहले भी शिकायतें, आंदोलन और ज्ञापन दिए गए, लेकिन व्यवस्था जस की तस रही।
नेतृत्व का हमला — “यह लापरवाही नहीं, सरकारी विफलता है”
पूर्व जिला पंचायत सदस्य व आदिवासी नेता मनोज साक्षी ने प्रशासन पर तीखा हमला बोलते हुए कहा “इमरजेंसी मरीज को लेकर आए और अस्पताल खाली मिला। अगर सिविल अस्पताल में इलाज नहीं मिलेगा, तो वनांचल के लोग जिंदा रहने की उम्मीद कहां करें?”
उन्होंने आरोप लगाया कि क्षेत्र को सिविल अस्पताल का दर्जा तो मिल गया, लेकिन डॉक्टर और संसाधन कागजों में ही हैं।
प्रशासन दौड़ा, भरोसा दिया — तब थमा गुस्सा
स्थिति बिगड़ती देख नगरी के एसडीएम और एसडीओपी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने जांच और सुधार का भरोसा दिया, जिसके बाद धरना समाप्त हुआ।
लेकिन ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है —
“अगर जल्द 24 घंटे डॉक्टर तैनात नहीं हुए, तो अगला आंदोलन और बड़ा होगा।”
सबसे बड़ा सवाल
सरकारी रिकॉर्ड में अस्पताल चालू, जमीन पर इमरजेंसी बंद —
क्या दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में जिंदगी की कोई कीमत नहीं?
बोरई की यह मौत सिर्फ एक युवक की नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की सांस टूटने की कहानी बन गई है।

