महानदी परियोजना के बांध विभाग में RTI पर टालमटोल, जवाब से बढ़े फर्जीवाड़े के संदेह

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महानदी परियोजना के बांध विभाग में RTI पर टालमटोल, जवाब से बढ़े फर्जीवाड़े के संदेह



उत्तम साहू 

धमतरी- नगरी। सूचना के अधिकार कानून के तहत पारदर्शिता सुनिश्चित करने का दावा करने वाले सरकारी विभाग ही यदि जानकारी देने से बचते दिखें, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। धमतरी जिले में महानदी परियोजना के बांध विभाग पर गंभीर आरोप लगे हैं कि आरटीआई आवेदन के बावजूद मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

आवेदक द्वारा नगरी स्थित कार्यालय में कार्यरत एक कर्मचारी की नियुक्ति, सेवा पुस्तिका, पदोन्नति और शैक्षणिक अभिलेखों से संबंधित दस्तावेजों की मांग की गई थी। लेकिन जनसूचना अधिकारी द्वारा यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि “कार्यालय में संबंधित जानकारी उपलब्ध नहीं है।”

40 वर्षों से एक ही कार्यालय में जमे रहने पर सवाल

सूत्रों के अनुसार संबंधित व्यक्ति ने कथित रूप से दैनिक मजदूर के रूप में कार्य प्रारंभ किया था और वर्तमान में बांध निरीक्षक के पद पर पदोन्नत है। आरोप है कि उसकी अंकसूची और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर गंभीर संदेह हैं।

बताया जा रहा है कि उक्त कर्मचारी का जन्म वर्ष 1963 बताया जाता है, इसके बावजूद अब तक सेवा निवृत्ति नहीं होने से भी संदेह गहराता है। यदि आयु संबंधी अभिलेखों में कोई विसंगति है तो यह प्रशासनिक लापरवाही ही नहीं, बल्कि संभावित फर्जीवाड़े का मामला भी हो सकता है।

“जानकारी उपलब्ध नहीं” — क्या यह जवाब पर्याप्त है?

विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शासकीय कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी की सेवा पुस्तिका, नियुक्ति आदेश, पदोन्नति पत्र और शैक्षणिक दस्तावेज अनिवार्य अभिलेख होते हैं। ऐसे में “जानकारी उपलब्ध नहीं” कहना या तो रिकॉर्ड प्रबंधन की भारी विफलता है या फिर तथ्यों को छिपाने का प्रयास।

यदि विभाग के पास कर्मचारी से जुड़े मूल अभिलेख ही उपलब्ध नहीं हैं, तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है—

  • क्या नियुक्ति प्रक्रिया विधिसम्मत थी?
  • क्या पदोन्नति नियमों के अनुरूप हुई?
  • क्या सेवा अवधि और आयु सत्यापन समय-समय पर किया गया?

जांच की मांग तेज

मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर आक्रोश व्याप्त है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं, बल्कि पूरी प्रणाली की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न है।

अब जरूरत है कि जिला प्रशासन इस प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराए, संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करे और यदि कोई अनियमितता पाई जाती है तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करे।

सूचना के अधिकार कानून का उद्देश्य पारदर्शिता और जवाबदेही है, न कि “जानकारी नहीं है” कहकर प्रश्नों को दबा देना। धमतरी में उठे इस मामले ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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