औषधीय खोज यात्रा में 193 विद्यार्थियों ने जाना जड़ी-बूटियों का महत्व
राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अभियान (रूसा) और उच्च शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ के तत्वावधान में शासकीय भानुप्रतापदेव स्नातकोत्तर महाविद्यालय कांकेर के नेतृत्व में औषधीय पौधों की खोज यात्रा का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में कांकेर सहित जिले के विभिन्न महाविद्यालयों के कुल 193 छात्र-छात्राओं ने भाग लेकर औषधीय पौधों के महत्व और उनके पारंपरिक उपयोग के बारे में जानकारी प्राप्त की।
कार्यक्रम का संचालन क्षेत्रीय अपर संचालक बस्तर संभाग प्रो. अनिल कुमार श्रीवास्तव के मार्गदर्शन तथा महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. चेतन राम पटेल के संरक्षण में हुआ। कार्यक्रम के नोडल अधिकारी विश्वास मेश्राम के नेतृत्व में विज्ञान लोकव्यापी कार्यक्रम के अंतर्गत इस खोज यात्रा का आयोजन किया गया।
प्रथम चरण में प्रतिभागियों का पंजीयन डॉ. अर्चना सिंह, डॉ. बसंत नाग, डॉ. लक्ष्मी लेकाम, सुरेंद्र सिन्हा और रिखी भुआर्य द्वारा किया गया। इसके बाद विद्यार्थियों को पांच समूहों में विभाजित कर विभिन्न प्राध्यापकों और विशेषज्ञों के नेतृत्व में ग्राम मर्रापी के मैदानी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में औषधीय पौधों की खोज के लिए भेजा गया। इस दौरान डॉ. एम.एल. नायक के नेतृत्व में विद्यार्थियों ने कई महत्वपूर्ण औषधीय पौधों की पहचान की।
यात्रा के दौरान विद्यार्थियों को दवई फूल, भिरहा, भालूमुसर, गोंदला, महुआगुड़ी, मांकड़ तेंदू, भूई नीम और शतावर जैसे पौधों के वैज्ञानिक नाम, स्थानीय नाम और उनके पारंपरिक औषधीय उपयोग के बारे में जानकारी दी गई। यह जानकारी स्थानीय वैद्यराज सोनसाय सेवता, मनोज पटेल, वीर सिंह पद्दा, गजानंद सिन्हा, श्रवण जैन और घनश्याम मंडावी ने साझा की।
कार्यक्रम के द्वितीय सत्र में महाविद्यालय की जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह भाऊ की अध्यक्षता में कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें डॉ. एम.एल. नायक मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। इस अवसर पर वक्ताओं ने औषधीय पौधों के संरक्षण और पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया।
नोडल अधिकारी विश्वास मेश्राम ने कहा कि विज्ञान और प्रकृति एक-दूसरे के पूरक हैं। पेड़-पौधों के बिना पर्यावरण और जीवन चक्र प्रभावित हो सकता है, इसलिए इनके संरक्षण के प्रति सभी को जागरूक होना आवश्यक है।
मुख्य अतिथि प्रो. एम.एल. नायक ने कहा कि प्राचीन ज्ञान और औषधीय पौधों से जुड़ी धरोहर को संरक्षित करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि एक वैद्य एक लाइब्रेरी के समान होता है, इसलिए उनके ज्ञान को भावी पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।
कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों और स्रोत व्यक्तियों को प्रमाण पत्र एवं स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए तथा खोजे गए औषधीय पौधों का प्रदर्शन भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रो. अलका केरकेट्टा ने किया।
इस अवसर पर महाविद्यालय के प्राध्यापक, अतिथि प्राध्यापक, तकनीकी टीम और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।


