छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
बिना विभागीय जांच या सक्षम आदेश के कर्मचारी का वेतन रोकना अवैध :
उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व मामले में कोर्ट ने कहा – नियमित सेवा देने वाले कर्मचारी को वेतन से वंचित नहीं किया जा सकता
बिलासपुर। हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि बिना विभागीय जांच, चार्ज मेमो या सक्षम प्राधिकारी के आदेश के किसी कर्मचारी का वेतन रोकना पूरी तरह मनमाना और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
न्यायमूर्ति की एकल पीठ ने यह निर्णय एम.आर. साहू बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य (WPS No. 1941/2025) मामले की सुनवाई के दौरान दिया।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता एम.आर. साहू वर्तमान में सहायक वन संरक्षक एवं सहायक निदेशक के पद पर पदस्थ हैं।
याचिका में बताया गया कि विभाग द्वारा अप्रैल 2024 से दिसंबर 2024 के बीच उनके वेतन में भारी कटौती कर दी गई थी। विभाग का आरोप था कि अधिकारी द्वारा कुछ अनियमितताएं की गई थीं और उन्हें नोटिस जारी किए गए थे, लेकिन उनके जवाब संतोषजनक नहीं पाए गए।
हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि विभाग ने न तो कोई विधिवत विभागीय जांच शुरू की थी और न ही कोई चार्ज मेमो जारी किया गया था।
अदालत की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि
- याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई चार्ज मेमो जारी नहीं किया गया था।
- कोई विभागीय जांच लंबित नहीं थी।
- कर्मचारी लगातार अपनी सेवाएं दे रहा था।
- केवल कार्यालयीन नोटशीट या आंतरिक टिप्पणियों के आधार पर वेतन रोकना कानूनन उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी को उसके वैधानिक वेतन से तब तक वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके खिलाफ कोई सक्षम आदेश, दंडात्मक कार्रवाई या कानूनी बाधा मौजूद न हो।
कोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए राज्य शासन एवं संबंधित विभाग को निर्देश दिए कि—
1. रोका गया पूरा वेतन जारी किया जाए
अप्रैल 2024 से दिसंबर 2024 तक रोकी गई संपूर्ण वेतन राशि तत्काल याचिकाकर्ता को प्रदान की जाए।
2. जीपीएफ भुगतान पर राहत
मामले की सुनवाई के दौरान विभाग द्वारा जीपीएफ भुगतान संबंधी मांग स्वीकार किए जाने को भी अदालत ने रिकॉर्ड पर लिया।
कर्मचारियों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी जानकारों के अनुसार यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के सेवा अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि प्रशासनिक स्तर पर दुर्भावनापूर्ण या पूर्वाग्रहपूर्ण कार्रवाई कर किसी कर्मचारी का वेतन नहीं रोका जा सकता।
यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है, जहां बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए कर्मचारियों पर आर्थिक दंडात्मक कार्रवाई की जाती है।
विभागीय कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस फैसले के बाद यह भी चर्चा तेज हो गई है कि के संबंधित अधिकारियों द्वारा बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए वेतन रोके जाने का निर्णय किस आधार पर लिया गया। अदालत की टिप्पणी से यह संकेत भी मिलता है कि संबंधित कार्रवाई पूर्वाग्रहपूर्ण मानी गई।

