🌺 गुरु पूर्णिमा पर्व पर विशेष 🌺
गुरु की महिमा अपरंपार — गुरु ही ज्ञान, संस्कार और जीवन का प्रकाश
उत्तम साहू
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान, विवेक और संस्कार का प्रकाश फैलाने वाला मार्गदर्शक होता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी महान गुरु-परंपरा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने का पावन अवसर है।
संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहा है
“बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि।
महामोह तम पुंज, जासु बचन रवि कर निकर॥”
अर्थात् मैं उन गुरु के चरण कमलों की वंदना करता हूं, जो कृपा के समुद्र और मानव रूप में भगवान के समान हैं। उनके वचन सूर्य की किरणों के समान हैं, जो मनुष्य के जीवन से महामोह और अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर देते हैं।
गुरु के चरणों में नमन करते हुए कहा गया है
“श्री गुरु पद नख मनि गन जोती।
सुमिरत दिव्य दृष्टि हिय होती॥
दलन मोह तम सो सप्रकाशू।
बड़े भाग उर आवइ जासू॥”
गुरु महाराज के चरण-नखों की ज्योति अनमोल रत्नों के प्रकाश के समान है। उनका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है। गुरु का ज्ञान मोह और अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर देता है। जिसके हृदय में गुरु का प्रकाश प्रवेश कर जाए, वह वास्तव में अत्यंत भाग्यशाली होता है।
गुरु-शिष्य परंपरा भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर
भारतीय संस्कृति में गुरु और शिष्य का संबंध अत्यंत पवित्र और अनुपम माना गया है। गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और संस्कारों के माध्यम से शिष्य के व्यक्तित्व का निर्माण करता है। वह शिष्य को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं देता, बल्कि जीवन जीने की कला, अनुशासन, संयम, संस्कार और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा भी देता है।
गुरु शिष्य को अपनी दिव्य संपदा का एक अंश प्रदान करता है। शिष्य उस ज्ञान और संस्कार को अनुशासनपूर्वक अपने जीवन में उतारकर अपने व्यक्तित्व को ऊंचा बनाता है। यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा को अनुशासन और आत्मविकास का पर्व भी कहा जाता है।
अनुशासन का पालन करने वाला व्यक्ति ही जीवन में वास्तविक सफलता प्राप्त कर सकता है। चाहे राष्ट्रीय प्रगति हो या आध्यात्मिक उन्नति, अनुशासन के बिना कोई भी लक्ष्य प्राप्त करना कठिन है।
जीवन रूपी भवसागर में गुरु ही सच्चे मार्गदर्शक
मानव जीवन को अत्यंत दुर्लभ माना गया है। यह संसार एक विशाल भवसागर के समान है, जिसे पार करना मनुष्य के लिए आसान नहीं। जिस प्रकार छोटी-सी चींटी भी लंबी यात्रा अकेले तय नहीं कर सकती, उसी प्रकार मनुष्य भी जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों से अकेले पार पाने में कई बार असमर्थ हो जाता है।
ऐसे समय में गुरु का मार्गदर्शन जीवन में प्रकाश बनकर आता है। यदि मनुष्य सद्गुरु का हाथ पकड़ ले और उनके बताए मार्ग पर श्रद्धा, विश्वास और अनुशासन के साथ चले, तो जीवन की कठिन से कठिन परिस्थितियों को भी पार किया जा सकता है।
संत कबीरदास जी ने गुरु की महिमा को अत्यंत सुंदर शब्दों में व्यक्त करते हुए कहा है
“सतगुरु मिले तो सब मिले, न तो मिला न कोय।
माता-पिता सुत बांधवा, ये तो घर-घर होय॥”
अर्थात् यदि सच्चे गुरु मिल जाएं तो जीवन में सब कुछ प्राप्त हो जाता है, लेकिन यदि सद्गुरु का सान्निध्य न मिले तो बहुत कुछ अधूरा रह जाता है। माता-पिता और रिश्ते तो प्रत्येक घर में होते हैं, लेकिन सच्चा मार्गदर्शक गुरु मिलना सौभाग्य की बात है।
गुरु ज्ञान, ध्यान और संस्कार का प्रकाश है
किसी कवि ने गुरु की महिमा को इन सुंदर शब्दों में व्यक्त किया है
गुरु हैं तो ज्ञान है, गुरु हैं तो ध्यान है,
गुरु हैं तो मान है, गुरु हैं तो यश है।
गुरु हैं तो कीर्ति है, गुरु हैं तो साहित्य है,
गुरु हैं तो चिंतन है, गुरु हैं तो संस्कार है।
गुरु हैं तो संस्कृति है और गुरु हैं तो विकृतियों का विनाश है। गुरु व्यवहार का दीप जलाते हैं और जीवन में प्रेम का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु ध्यान की ज्योति जगाते हैं और गरिमा का गुलाब खिलाते हैं। गुरु जीवन के हर सवाल का जवाब हैं, हर मुश्किल की युक्ति हैं और ज्ञान का विशाल भंडार हैं।
गुरु जीवन के मार्गदर्शक हैं, गुरु अहसास हैं, गुरु प्रेम हैं, गुरु ज्ञान की वाणी हैं। गुरु हमारे जीवन का चमत्कार हैं, सच्चे मित्र हैं, भगवान के रूप हैं और अध्यात्म की परिभाषा हैं।
गुरु का सम्मान ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी
जिस व्यक्ति के मन में अपने गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धा और सम्मान होता है, उसके जीवन में सफलता के द्वार स्वयं खुलते जाते हैं। गुरु के प्रति श्रद्धा केवल उनके चरणों में नमन करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलना ही गुरु के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
गुरु पूर्णिमा हमें यह संदेश देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी ऊंचाइयां प्राप्त कर लें, हमें अपने गुरु, माता-पिता और मार्गदर्शकों के प्रति सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए। गुरु हमारे जीवन को दिशा देते हैं, हमारी कमियों को दूर करते हैं और हमें स्वयं का बेहतर रूप बनने की प्रेरणा देते हैं।
जिसके मन में अपने गुरु के लिए सच्चा सम्मान होता है,
एक दिन सारा जहां उसके कदमों में होता है।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर सभी गुरुजनों को शत-शत नमन। 🙏🌺
संकलन : उत्तम साहू
संपादक, दबंग छत्तीसगढ़िया न्यूज
मो. नं. 7389950798

