औषधीय पौधों से रोजगार और आय की नई राह, 1,000 वैद्यराजों के प्रमाणीकरण की तैयारी : विकास मरकाम

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औषधीय पौधों से रोजगार और आय की नई राह, 1,000 वैद्यराजों के प्रमाणीकरण की तैयारी : विकास मरकाम

डेढ़ वर्ष में औषधीय पौधों का संरक्षण, हजारों महिलाओं को रोजगार से जोड़ने और पारंपरिक वैद्यों के प्रशिक्षण पर बोर्ड का विशेष फोकस

उत्तम साहू 

रायपुर, 7 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ की समृद्ध वन संपदा, औषधीय पौधों और पारंपरिक स्वास्थ्य ज्ञान को संरक्षित करने के साथ-साथ इसे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार और आय से जोड़ना छत्तीसगढ़ आदिवासी, स्थानीय स्वास्थ्य परम्परा एवं औषधि पादप बोर्ड की प्रमुख प्राथमिकता है। बोर्ड के अध्यक्ष विकास मरकाम ने अपने डेढ़ वर्ष के कार्यकाल की उपलब्धियों और आगामी योजनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि किसानों, महिलाओं, वनवासियों और पारंपरिक वैद्यों को केंद्र में रखकर कई महत्वपूर्ण पहल की गई हैं।

विकास मरकाम ने कहा कि बोर्ड का उद्देश्य केवल औषधीय पौधों का संरक्षण करना नहीं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़कर लोगों के लिए रोजगार एवं आय के नए अवसर तैयार करना भी है।


10 हजार हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र में औषधीय पौधों का रोपण

पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान 10,602 हेक्टेयर वन क्षेत्र में आठ वनमंडलों—खैरागढ़, बस्तर, कोंडागांव, मुंगेली, दक्षिण कोंडागांव, कांकेर, रायगढ़ तथा महासमुंद—में स्थानीय औषधीय प्रजातियों का सघन रोपण कराया गया। इस पहल से 42 ग्रामों को लाभ मिला है।

वहीं नियद नेल्लनार योजना के तहत बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, बस्तर एवं कोंडागांव जिलों के 21 गांवों में लगभग 10 लाख पौधों का रोपण किया गया है।


औषधीय खेती से किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर

वन क्षेत्रों के बाहर किसानों को औषधीय पौधों की खेती के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। किसान समूहों के माध्यम से लगभग 867.90 एकड़ क्षेत्र में औषधीय पौधों का कृषिकीकरण कराया गया है।

इसमें लेमनग्रास, पचौली, सिट्रोनेला, अश्वगंधा, बच, ब्राह्मी और सतावर जैसी महत्वपूर्ण औषधीय प्रजातियां शामिल हैं। बोर्ड द्वारा धान के विकल्प के रूप में बच और ब्राह्मी की खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। लगभग 89 एकड़ क्षेत्र में इस प्रकार की खेती को प्रोत्साहित किया गया है।

मरकाम ने कहा कि किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय फसलों की खेती का विकल्प उपलब्ध कराकर उनकी आय बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।


महिलाओं को औषधीय पौधों से जोड़कर रोजगार के अवसर

महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में भी बोर्ड ने विशेष पहल की है। धमतरी जिले में महानदी के किनारे और पंचायत भूमि पर 120 एकड़ क्षेत्र में खस का रोपण कराया गया है।

इसके अलावा गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, बिलासपुर, कांकेर, धमतरी और कोरबा जिलों के 65 गांवों की 1,854 महिलाओं को औषधीय पौधों के रोपण से जोड़ा गया। इन महिलाओं द्वारा 64,798 सिंदूरिया और 7,48,092 सतावर पौधों का रोपण किया गया, जिससे रोजगार और आय के नए अवसर तैयार हुए हैं।


6,140 पारंपरिक वैद्यों को मिला प्रशिक्षण

छत्तीसगढ़ की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति और स्थानीय स्वास्थ्य परंपराओं के संरक्षण के लिए बोर्ड द्वारा पारंपरिक वैद्यों के प्रशिक्षण पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। राज्य के 24 जिलों के 6,140 पारंपरिक वैद्यों को 10 प्रशिक्षण एवं सम्मेलनों के माध्यम से प्रशिक्षित किया गया है।

हर्बल उत्पादों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से राज्य में 45 ग्राइंडिंग मशीनें भी पारंपरिक वैद्यों को उपलब्ध कराई गई हैं।


अब 1,000 वैद्यराजों को मिलेगी प्रमाणित पहचान

विकास मरकाम ने बताया कि पारंपरिक वैद्यों के ज्ञान और अनुभव को व्यवस्थित एवं प्रमाणित पहचान दिलाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल की गई है। प्रदेशभर के लगभग 1,000 वैद्यराजों के प्रमाणीकरण के लिए क्वालिटी कंट्रोल ऑफ इंडिया से अधिकृत संस्था सीटीटीसी, त्रिवेंद्रम के साथ एमओयू किया गया है।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक चिकित्सा पद्धति, वन संपदा और औषधीय पौधों में रोजगार एवं आर्थिक विकास की अपार संभावनाएं हैं। आने वाले समय में बोर्ड किसानों, वनवासियों, महिलाओं और पारंपरिक वैद्यों को अधिक अवसर उपलब्ध कराने के साथ पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण और बाजार से जोड़ने की दिशा में लगातार कार्य करेगा।

“औषधीय पौधों के संरक्षण के साथ पारंपरिक ज्ञान को रोजगार और आय से जोड़ना हमारी प्राथमिकता है। छत्तीसगढ़ की समृद्ध स्वास्थ्य परंपरा को नई पहचान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे।” — विकास मरकाम

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