जहां कभी बह जाता था बारिश का पानी, अब वहीं लिखी जा रही समृद्धि की कहानी
कुकरेल में 200 से अधिक फार्म पॉन्ड बने जल संरक्षण और आजीविका का मॉडल, मछली पालन से ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय का अवसर
उत्तम साहू,धमतरी, 8 सितंबर 2026। धमतरी जिले के आदिवासी अंचल नगरी विकासखंड के कुकरेल क्षेत्र में कभी बारिश का पानी बहकर निकल जाता था। खेतों में पानी के ठहराव की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से किसानों को सिंचाई के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ता था। अब यही वर्षाजल ग्रामीणों की आजीविका और अतिरिक्त आय का आधार बन रहा है। वीबी-जी रामजी योजना के तहत निर्मित फार्म पॉन्ड जल संरक्षण को आजीविका से जोड़कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रहे हैं।
कुकरेल क्लस्टर में योजना के तहत 200 से अधिक फार्म पॉन्ड का निर्माण किया गया है। प्रत्येक डबरी का आकार लगभग 20 मीटर × 20 मीटर × 3 मीटर है। इन जल संरचनाओं में बारिश के पानी का संरक्षण होने से किसानों को सिंचाई के लिए अतिरिक्त जल स्रोत उपलब्ध हुआ है। इसके साथ ही अब इन्हीं डबरियों का उपयोग मत्स्य पालन जैसी आयमूलक गतिविधियों के लिए भी किया जा रहा है।
आईएमसी और झींगा पालन से बढ़ी आय की उम्मीद
कुकरेल की इन डबरियों में आईएमसी (इंडियन मेजर कार्प) और झींगा मछली पालन किया जा रहा है। प्रत्येक डबरी में लगभग 320 आईएमसी और 1600 झींगा मछली के बीज डाले गए हैं। बेहतर प्रबंधन और नियमित देखरेख के परिणामस्वरूप आईएमसी मछलियां अब 400 से 500 ग्राम तक पहुंच चुकी हैं। इससे ग्रामीण परिवारों को खेती के साथ अतिरिक्त आमदनी का एक नया विकल्प मिला है।
इस पहल के तहत लगभग 2.30 लाख रुपये की स्वीकृति के साथ जल संरचनाओं को आजीविका से जोड़ने का कार्य किया गया है। वहीं ABIS CSR के सहयोग से हितग्राहियों को तकनीकी प्रशिक्षण, सब्सिडी पर आहार उपलब्ध कराने तथा निरंतर मॉनिटरिंग की व्यवस्था की जा रही है। इससे ग्रामीणों को मत्स्य पालन की वैज्ञानिक तकनीकों की जानकारी मिल रही है और उत्पादन बेहतर करने में मदद मिल रही है।
जल संरक्षण से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते ग्रामीण
कुकरेल क्षेत्र की यह पहल विशेष रूप से आदिवासी अंचल के ग्रामीण परिवारों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पहले जहां बारिश का पानी बिना उपयोग के बह जाता था, वहीं अब उसी पानी को संरक्षित कर कृषि, मत्स्य पालन और रोजगार से जोड़ा जा रहा है। इससे ग्रामीण परिवारों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित होने के साथ आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिल रहा है।
कुकरेल का यह मॉडल यह संदेश देता है कि यदि जल संरक्षण को स्थानीय संसाधनों, तकनीकी मार्गदर्शन और आजीविका के अवसरों से जोड़ा जाए, तो एक छोटी जल संरचना भी ग्रामीण विकास का प्रभावी माध्यम बन सकती है। कुकरेल की डबरियां अब सिर्फ पानी सहेजने की संरचनाएं नहीं रहीं, बल्कि ग्रामीण परिवारों के लिए रोजगार, अतिरिक्त आय और आत्मनिर्भरता की नई उम्मीद बन रही हैं।

