विलुप्त हो रही होली की पुरानी परम्पराएं

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विलुप्त हो रही होली की पुरानी परम्पराएं

नगांडा और मांदर के थाप पर फाग गीत और राधा कृष्ण गोप गोपियों के वेशभूषा में डंडा नाच अब देखने को नहीं मिलता 



उत्तम साहू 

नगरी/ आज होली का त्यौहार है लेकिन कहीं भी होली त्योहार पर उमंग उत्साह नहीं दिखाई दे रही है। पहले फाल्गुन मास लगते ही चारों तरफ होली आने की आहट दिखाई देता था पूरे माह भर चलने वाली होली का यह पर्व केवल दो या तीन दिन में सिमट कर रह गई है होली के पहले गांव की चौपालों पर होने वाले सामूहिक फाग, होलिकादहन के समय घर घर से कंडे लेकर लोगों का पहुंचना, होली जलते समय बड़े बुजुर्गों द्वारा साररार्रा से प्रारंभ होकर गाये जाने वाला गीत,अगले दिन रंग व अबीर से सराबोर होलियारों की टोली द्वारा घर घर पहुंचकर लोगों से गले मिलकर एकता व भाईचारे का संदेश देना सब स्वप्न जैसा हो गया है।

आपाधापी के इस दौर में प्राचीन परम्पराएं लुप्त होती जा रही हैं। पिछले कुछ वर्षों से अब गांवों में भी युवा वर्ग में होली का एक नया रूप सामने आया है जिसमें पेंट की होली, कीचड़ की होली, नशे की होली, कपड़ा फाड़ होली जैसे कार्यक्रम शामिल हैं जो आम जनजीवन को पसंद नहीं है। होली त्यौहार के आसपास गाये जाने वाले लोकधुनों पर आधारित माटी के गीतों का बदलता लोकरंग आज के बदलते परिवेश में गुम होता जा रहा है,

हम बात करें नगरी नगर के होली की तो ग्राम पंचायत के जमाने से होली के दिन बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित किया जाता रहा है, जहां ढोल, नंगाडे़ व मंजीरे की थाप पर होली गीत गाये जाते थे जहां नगर भर के लोग कुछ घंटों के लिए आपसी भेदभाव छोड़कर इकट्ठे होते थे। इससे नगर में वैमनस्य कम होने के साथ आपसी तालमेल और भाईचारे का संबंध बढ़ता था यह परंपरा नगर पंचायत बनने के बाद भी अनवरत जारी है,लेकिन इस बार होली मिलन समारोह का आयोजन नहीं होने से वर्षों पुरानी परंपरा का रिकॉर्ड टूटा है, बताया गया कि आचार संहिता लागू होने से कार्यक्रम को निरस्त किया गया है, 




नगर एवं प्रदेशवासियों को होली की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं आपसी प्रेम,भाईचारा,सौहार्द्र और रंगों का महापर्व "होली" आपके जीवन को सप्तरंगी 'खुशियों' से सराबोर कर दे। इसी शुभकामनाओं के साथ 🙏🏼💐🙏

संपादक उत्तम साहू दबंग छत्तीसगढ़िया न्यूज़





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