मगरलोड तहसील में राजस्व घोटालों का सिलसिला जारी:
ग्राम भोथा का भौगोलिक रकबा अवैध रूप से बढ़ाया, आदिवासी भूमि हड़पी गई
उत्तम साहू,मगरलोड (धमतरी), 24 दिसंबर 2025:
धमतरी जिले की मगरलोड तहसील राजस्व विभाग की लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार का गढ़ बनती जा रही है। पूर्व तहसीलदार श्री गोहिया के कथित कारनामों की चर्चा अभी थमी भी नहीं थी कि वर्तमान तहसीलदार श्री भारद्वाज उनके पदचिह्नों पर चलते दिख रहे हैं। स्थानीय किसान इन्हें 'गोहिया 2.0' कहकर पुकारने लगे हैं। तहसील में नियम-कानूनों की खुलेआम अनदेखी हो रही है, जिससे आम आदमी और आदिवासी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहा है।
(बनावटी) ग्राम भोथा का मामला इसकी जीती-जागती मिसाल है। निवासी (बनावटी) हरिओम, पिता गेंदू ने अपनी भूमि खसरा नंबर(अनुमानित/उदाहरण मात्र) 1221, रकबा 0.04 हेक्टेयर के स्थान पर बंदोबस्त पूर्व खसरा (अनुमानित/उदाहरण मात्र) 559, रकबा 0.486 हेक्टेयर होने का हवाला देते हुए सुधार आवेदन दिया। तत्कालीन तहसीलदार श्री गोहिया ने राजस्व निरीक्षक श्रीगौर से जांच कराई। निरीक्षक ने रिपोर्ट में कहा कि नक्शा अनुसार कब्जा 0.48 हेक्टेयर है और सुधार से ग्राम का भौगोलिक रकबा प्रभावित नहीं होगा। लेकिन आरोप है कि निरीक्षक ने कथित रिश्वत लेकर गलत रिपोर्ट दी, जिसमें ग्राम का कुल रकबा 0.44 हेक्टेयर बढ़ाने का प्रस्ताव था। बंदोबस्त त्रुटि सुधार में रकबा बढ़ाने पर दूसरे खसरे से समायोजन अनिवार्य होता है, ताकि ग्राम का कुल भौगोलिक रकबा स्थिर रहे। फिर भी श्री गोहिया ने सभी नियमों को ताक पर रखकर रकबा 0.486 हेक्टेयर करने का आदेश पारित कर दिया। उस समय रकबा सुधार का अधिकार तहसीलदार के पास था, लेकिन शासन को राज्यभर में केवल रकबा बढ़ाने के मामलों का पता चलने पर यह अधिकार SDM को दे दिया गया। यह स्पष्ट रूप से नियमों का दुरुपयोग लगता है, जिससे ग्राम का कुल रकबा अवैध रूप से बढ़ गया।
इसी तहसील में वर्तमान तहसीलदार श्री भारद्वाज का एक और मामला सामने आया है।(अनुमानित/उदाहरण मात्र) ग्राम पांहदा (भोथा से लगा) की भूमि खसरा नंबर 656, रकबा 0.10 हेक्टेयर वर्ष 2024-25 तक नीलकंठ, पिता रामजी (गोंड जाति) के नाम दर्ज थी। आवेदक बालमुकुंद, पिता सुंदरलाल (कलार जाति) ने बंदोबस्त के बाद रकबा कम होने का हवाला देकर धारा 89 के तहत सुधार आवेदन दिया। राजस्व निरीक्षक श्री ठाकुर ने रिपोर्ट दी कि नया खसरा पुराने का भाग है और आवेदक का कब्जा है। अनावेदक नीलकंठ को नोटिस दी गई, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ। इसके बाद श्री भारद्वाज ने एकपक्षीय आदेश पारित कर गैर-आदिवासी के नाम पर भूमि दर्ज कर दी। राजस्व विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बंदोबस्त त्रुटि सुधार से आदिवासी या शासकीय भूमि प्रभावित हो रही हो, तो SDM के माध्यम से कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य है। लेकिन यहां बिना अनुमति के आदेश पारित हुआ, जो आदिवासी भूमि हस्तांतरण नियमों का घोर उल्लंघन है।
आरोप है कि पटवारी ध्रुव (आदिवासी होने के बावजूद) की मुख्य भूमिका है। बस्तर से आए इस पटवारी ने तहसीलदार को अवगत नहीं कराया और आवेदक से साठगांठ कर अभिलेख सुधार दिया। आदिवासी किसान नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं कि तीनों हल्कों में आदिवासी पटवारी कार्यरत हैं, जो गर्व की बात है, लेकिन ये ही सबसे ज्यादा रिश्वत लेते हैं। छोटे काम के लिए भी पैसे मांगते हैं। शिकायत करने पर कुछ नहीं होता, इसलिए अब चुपचाप रिश्वत देकर काम करवाते हैं। पटवारी ध्रुव से जब सेवा की बात की जाती है, तो जवाब मिलता है – "सेवा करने होते तो बस्तर से यहां क्यों आता?"
ये मामले मगरलोड तहसील की राजस्व व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाते हैं। क्या जिला कलेक्टर इन पर संज्ञान लेंगे और कार्रवाई करेंगे, या भ्रष्टाचार का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? आम किसान और आदिवासी थक चुके हैं, न्याय की उम्मीद अब खोने लगी है।

