धमतरी राजस्व अनदेखी पार्ट–2 धारा 89–115 की अनदेखी: प्रशासनिक लापरवाही, संगठित साजिश या भ्रष्टाचार की जड़ें..?

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धमतरी राजस्व अनदेखी पार्ट–2
धारा 89–115 की अनदेखी: प्रशासनिक लापरवाही, संगठित साजिश या भ्रष्टाचार की जड़ें..?



उत्तम साहू 

 धमतरी। छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 89 और 115 के प्रावधानों की अनदेखी अब अपवाद नहीं, बल्कि एक चलन बनती दिख रही है। 21 दिसंबर 2025 को प्रकाशित पूर्व रिपोर्ट में जिले की तीन तहसीलों में हुए ऐसे ही मामलों का खुलासा हुआ था। अब उसी कड़ी में नगरी तहसील के दो और धमतरी तहसील के एक नए प्रकरण सामने आए हैं, जिन्होंने पटवारियों, राजस्व निरीक्षकों और तहसीलदारों की संदिग्ध भूमिका को उजागर कर दिया है।

इन मामलों में बंदोबस्त त्रुटि सुधार की आड़ में ऐसे आदेश पारित किए गए, जो वस्तुतः सामान्य त्रुटि की श्रेणी में आते थे। जानकारों का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल कानून के विपरीत है, बल्कि इससे किसानों की जमीनों पर अवैध दखल और हेराफेरी की आशंका भी बढ़ जाती है।

नगरी तहसील: बंदोबस्त त्रुटि की आड़ में नियमों की अनदेखी

ग्राम देवपुर निवासी सुरेश नेताम पिता मायाराम नेताम का मामला इस पूरे घटनाक्रम की बानगी है। सुरेश ने बंदोबस्त पूर्व अभिलेखों का हवाला देकर वर्तमान पटवारी अभिलेख में नक्शा त्रुटि सुधार के लिए तहसीलदार नगरी के न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया। तत्कालीन तहसीलदार ने प्रकरण को धारा 89 शीर्षक अ–5 (बंदोबस्त त्रुटि सुधार) में दर्ज कर राजस्व निरीक्षक सिहावा को जांच सौंपी।

जांच में बंदोबस्त पूर्व खसरा नंबर 38/6 और वर्तमान खसरा 200 का मिलान कर ऑनलाइन नक्शा सुधार की सिफारिश कर दी गई, जबकि यह स्पष्ट रूप से सामान्य त्रुटि का मामला था। इसके बावजूद तहसीलदार ने प्रकरण समाप्त करने के बजाय इसे अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) नगरी और फिर अपर कलेक्टर तक भेजा, जहां से अनुमोदन मिल गया। अंततः पटवारी को नक्शा सुधार का आदेश जारी कर दिया गया।

राजस्व मामलों के जानकारों का कहना है कि जब तहसीलदार को यह स्पष्ट हो चुका था कि मामला बंदोबस्त त्रुटि का नहीं है, तब भी प्रक्रिया आगे बढ़ाना जानबूझकर की गई साजिश की ओर इशारा करता है।

ग्राम परसापानी: गलत धारा में नाम जोड़ने का आदेश

इसी तहसील के ग्राम परसापानी में जोहरीलाल पिता चैतुराम के मामले में भी यही स्थिति सामने आई। जोहरीलाल ने बंदोबस्त पूर्व अभिलेखों के आधार पर वर्तमान अभिलेख में नाम जोड़ने का आवेदन दिया। प्रकरण को धारा 89 शीर्षक अ–5 में दर्ज कर जांच कराई गई।

राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट में बताया गया कि 1987–88 से 1997–98 तक तथा बंदोबस्त पूर्व अभिलेखों में आवेदक का नाम सह-खातेदार के रूप में दर्ज रहा है, इसलिए वर्तमान अभिलेख में शामिल किया जाए। इसी आधार पर तहसीलदार ने पटवारी को नाम सुधार का आदेश दे दिया।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला भी सामान्य त्रुटि का था, जिसे धारा 115 में लिया जाना चाहिए था। आरोप है कि कथित रूप से रिश्वत लेकर न्यायालय को गुमराह किया गया, जिससे गलत धारा में आदेश पारित हो सका।

धमतरी तहसील: सामान्य त्रुटि बनाम बंदोबस्त त्रुटि की उलटबांसी

धमतरी तहसील के ग्राम संबलपुर में महेश राव शिंदे का प्रकरण उलट जरूर है, लेकिन उतना ही गंभीर। महेश ने बंदोबस्त पूर्व खसरा 146/2 (0.20 हेक्टेयर) जो वर्तमान में खसरा 251 है के आधार पर नाम दर्ज करने का आवेदन दिया।

यहां तहसीलदार ने प्रकरण को धारा 115 शीर्षक अ–6(अ) (सामान्य त्रुटि) में दर्ज किया। पटवारी की रिपोर्ट में बताया गया कि 1983 की रजिस्ट्री में खसरा नंबर की त्रुटि को नामांतरण में सुधारा गया था, लेकिन नए बंदोबस्त में आवेदक के नाम पर खसरा नहीं बना। वर्तमान अभिलेख में शकुंतला का नाम दर्ज है। इसके बावजूद तहसीलदार ने बंदोबस्त त्रुटि को सामान्य त्रुटि मानकर सुधार का आदेश दे दिया।

यहां भी सवाल उठता है कि जब मामला स्पष्ट रूप से बंदोबस्त त्रुटि का था, तो उसे सामान्य त्रुटि में क्यों निपटाया गया?

भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें और प्रशासन की चुप्पी

इन तीनों मामलों से यह स्पष्ट होता है कि जिले में राजस्व प्रकरणों में धाराओं का मनमाना उपयोग किया जा रहा है। पटवारी से लेकर तहसीलदार और उच्च अधिकारियों तक की मिलीभगत के आरोप सामने आ रहे हैं। इससे किसानों में असंतोष और अविश्वास गहराता जा रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिला कलेक्टर द्वारा अधीनस्थ राजस्व न्यायालयों की नियमित जांच क्यों नहीं कराई जा रही?
यदि जांच होती है, तो अब तक कितने अधिकारियों पर कार्रवाई हुई?
या फिर ये प्रकरण भी पहले की तरह ठंडे बस्ते में डाल दिए जाएंगे?

निष्कर्ष

धमतरी जिले के ये प्रकरण केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक संभावित संगठित भ्रष्टाचार की ओर संकेत करते हैं। यदि समय रहते निष्पक्ष जांच और कड़ी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह घोटाला और बड़े स्तर पर फैल सकता है, जिसका सीधा खामियाजा आम किसानों को भुगतना पड़ेगा। जिला प्रशासन की चुप्पी संदेह को और मजबूत कर रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन के लिए शुभ संकेत नहीं है।

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