वन परिक्षेत्र कार्यालय..रिसगांव की जगह 30 किमी दूर सांकरा में

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वन परिक्षेत्र कार्यालय..रिसगांव की जगह 30 किमी दूर सांकरा में 

ग्रामीणों की मांग..वन परिक्षेत्र कार्यालय को तत्काल रिसगांव में स्थानांतरित किया जाए


उत्तम साहू 

नगरी/ उदंती सीता नदी टाइगर रिजर्व गरियाबंद के अंतर्गत आने वाला वन परिक्षेत्र रिसगांव आज प्रशासनिक लापरवाही का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है। हैरानी की बात यह है कि जिस रिसगांव से पूरे वन क्षेत्र की निगरानी होनी चाहिए, वहां कार्यालय न रखकर वन विभाग ने उसे 30 किलोमीटर दूर ग्राम सांकरा में खोल रखा है। जिससे पूरे क्षेत्र में वन सुरक्षा व्यवस्था मजाक बनकर रह गई है। सवाल साफ है, क्या कार्यालय भी अब अफसरों की सहूलियत देखकर बनाया गया है..?



स्थानीय लोगों का आरोप है कि कार्यालय की दूरी का सीधा फायदा लकड़ी माफिया और अवैध कटाई करने वालों को मिल रहा है। समय पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई के अभाव में जंगलों की बेतहाशा कटाई हो रही है, लेकिन वन विभाग आंख मूंदे बैठा है।

इतना ही नहीं, क्षेत्र के पुल-पुलिया और जर्जर सड़कें ग्रामीणों की परेशानी को और बढ़ा रही हैं। हालात ऐसे हैं कि आम लोगों का आवागमन तक दुश्वार हो गया है। ग्रामीणों का कहना है कि जब भी मूलभूत सुविधाओं के विकास की बात उठती है, वन विभाग नियमों का हवाला देकर रोड़ा बन जाता है, लेकिन खुद अपनी जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह लापरवाह नजर आता है।

स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों में इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि जिस स्थान पर कार्यालय होना चाहिए  यानी रिसगांव में कार्यालय नहीं रखकर वन विभाग खुद जंगलों की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहा है।

ग्रामीणों की साफ मांग है कि वन परिक्षेत्र कार्यालय को तत्काल रिसगांव में स्थानांतरित किया जाए, ताकि निगरानी मजबूत हो, अवैध कटाई पर अंकुश लगे और वन सुरक्षा व्यवस्था वास्तव में चाक-चौबंद हो सके।

जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का सीधा आरोप

स्थानीय नागरिकों और जनप्रतिनिधियों का साफ कहना है कि “अगर कार्यालय रिसगांव में होता, तो सड़क पुल पुलिया सहित जंगल की हालत ऐसी नहीं होती।” इनका कहना है कि वन परिक्षेत्र कार्यालय को तत्काल रिसगांव स्थानांतरित किया जाए। या फिर जंगल कटते रहेंगे और फाइलों में “सब ठीक” लिखा जाता रहेगा?

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग इस गंभीर मुद्दे को समझेगा? या फिर जंगल यूं ही विभागीय लापरवाही की भेंट चढ़ते रहेंगे?

जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक “वन संरक्षण” सिर्फ कागज़ों की कहानी बनकर रह जाएगा।


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