शिक्षा संस्थानों में बढ़ता भ्रष्टाचार बना गंभीर चुनौती

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शिक्षा संस्थानों में बढ़ता भ्रष्टाचार बना गंभीर चुनौती

नगरी डाइट में नकल, शिक्षकों की कमी और अनियमितताओं ने खोली शिक्षा विभाग की पोल



उत्तम साहू 

नगरी-धमतरी / धमतरी जिले के आदिवासी विकास खंड नगरी में शिक्षा व्यवस्था भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। भ्रष्टाचार यहां केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि मूर्त और अमूर्त दोनों रूपों में अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जहां भ्रष्टाचार की छाया न पड़ी हो। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि समाज का सबसे पवित्र माना जाने वाला शिक्षा क्षेत्र भी अब भ्रष्टाचार का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है।


1961 से संचालित प्रशिक्षण संस्थान पर उठे गंभीर सवाल

नगरी विकास खंड में वर्ष 1961 से बुनियादी प्रशिक्षण संस्थान के रूप में संचालित यह शैक्षणिक संस्था वर्ष 2005 में उन्नयन के बाद जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डाइट) के रूप में स्थापित हुई। यहां से हजारों छात्र-छात्राएं डी.एल.एड. (पूर्व डीएड) की पढ़ाई कर शिक्षक बनने का सपना संजोते हैं।
लेकिन वर्तमान हालातों को देखते हुए यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह संस्थान वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षक तैयार कर पा रहा है?


नकल प्रकरण से डाइट नगरी की साख पर बट्टा

दिनांक 23 मार्च 2025 को डाइट नगरी में पंडित सुंदरलाल शर्मा द्वारा संचालित डी.एल.एड. द्वितीय वर्ष के प्रशिक्षु शिक्षकों की प्रायोगिक परीक्षा आयोजित की गई थी। इस दौरान रुपए लेकर नकल कराए जाने का सनसनीखेज मामला सामने आया, जिसने पूरे शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया।
मामले के उजागर होने के बाद परीक्षा को निरस्त कर दिया गया, लेकिन केवल परीक्षा रद्द कर देना इस गंभीर अपराध का समाधान नहीं माना जा सकता। जानकारों का कहना है कि यदि इस नकल प्रकरण में शामिल दोषी शिक्षकों पर बर्खास्तगी जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका नहीं जा सकेगा।


20 वर्षों से प्रभारी व्यवस्था के भरोसे संस्थान

चौंकाने वाली बात यह है कि विगत 20 वर्षों से यह संस्थान प्रभारी प्राचार्य और प्रतिनियुक्त शिक्षकों के भरोसे संचालित किया जा रहा है। राज्य और केंद्र सरकार शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद यहां स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो पाई है।
वर्तमान में केवल एक प्रभारी प्राचार्य और तीन शिक्षकों के भरोसे पूरे संस्थान का संचालन किया जा रहा है। इनमें से एक शिक्षक नरेंद्र देवांगन, वर्ष 2021 से घोटगांव स्कूल से प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ हैं। सवाल यह है कि बिना पर्याप्त शिक्षकों के छात्र-छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे दी जा सकती है?


छेड़खानी के आरोपों ने गुरु-शिष्य परंपरा को किया शर्मसार

डाइट नगरी पहले भी विवादों में रह चुका है। संस्थान के दो शिक्षकों पर छात्राओं के साथ छेड़खानी के गंभीर आरोप लगे थे। यह मामला गुरु-शिष्य की पवित्र परंपरा को शर्मसार करने वाला था।
इसके बावजूद जांच के नाम पर लीपापोती किए जाने और दोषियों को बचाने के आरोप सामने आए। आज तक इन शिक्षकों पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना इस बात का प्रमाण है कि व्यवस्था के भीतर कहीं न कहीं संरक्षण दिया जा रहा है। इससे उन ईमानदार शिक्षकों की छवि भी धूमिल होती है, जो निष्ठा के साथ बच्चों के भविष्य निर्माण में जुटे हुए हैं।


गुणवत्ता सुधार के नाम पर करोड़ों का खेल

शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा प्रति वर्ष करोड़ों रुपये का बजट जारी किया जाता है। लेकिन आरोप है कि इस राशि का फर्जी बिल-बाउचर बनाकर बंदरबांट किया जा रहा है।
शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई न होना इस ओर संकेत करता है कि उच्च स्तर तक भ्रष्टाचार की जड़ें फैली हुई हैं। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह खोखली हो जाएगी।


कठोर नियम और सख्त सजा की आवश्यकता

विशेषज्ञों और अभिभावकों का मानना है कि शिक्षा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर और प्रभावी नियमों के साथ-साथ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया जाना आवश्यक है।
जब तक दोषियों को उदाहरणात्मक सजा नहीं मिलेगी, तब तक शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सुधार की उम्मीद करना बेमानी होगा।


अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शिक्षा विभाग और शासन इस गंभीर मामले पर क्या ठोस कदम उठाते हैं, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।


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