राजनीति: जनसेवा का मुखौटा या सत्ता का व्यापार?

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राजनीति: जनसेवा का मुखौटा या सत्ता का व्यापार? 

नगरी सिहावा में सक्रिय 'छुटभैय्या नेताओं' का काला खेल

संपादक की कलम से राजनीति पर कड़ा प्रहार.. पढ़िए पूरी खबर 


उत्तम साहू 

नगरी सिहावा/ छत्तीसगढ़ के नगरी सिहावा क्षेत्र में राजनीति अब जनसेवा से कहीं अधिक सत्ता और धन के व्यापार का रूप ले चुकी है। अवैध गतिविधियों की आड़ में सक्रिय कथित नेताओं का जाल इतना जकड़ चुका है कि सड़क, पानी, शिक्षा जैसी बुनियादी समस्याएँ हाशिए पर सरक गई हैं। क्या यह लोकतंत्र की हत्या नहीं?


कभी राजनीति को समाजसेवा का सर्वोच्च मंच माना जाता था, जहाँ साधारण व्यक्ति असाधारण संकल्प से राष्ट्र-निर्माण करता था। लेकिन आज यह परिभाषा धुंधली हो चुकी है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कई नेता पद का दुरुपयोग निजी स्वार्थ साधने में कर रहे हैं। नगरी सिहावा में हाल के वर्षों में हुए दर्जनों भ्रष्टाचार के मामले इसका जीता-जागता प्रमाण हैं, जिनमें अवैध खनन, जमीन हड़पना और सरकारी योजनाओं का गबन प्रमुख हैं। 

कटु सत्य यह है कि अनैतिक-अवैध कार्यों में लिप्त स्वार्थी 'छुटभैय्या नेता' जनसेवा की आड़ में सत्ता का संरक्षण पाते हैं। वे भ्रष्टाचार की खुली लूट मचाते हैं, जिससे न केवल उनकी पार्टी की छवि धूमिल होती है, बल्कि क्षेत्र का विकास ठप हो जाता है। 

एक वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कुछ दलाल प्रवृत्ति के स्वघोषित नेता भाजपा का भगवा चोला ओढ़कर, बड़े नेताओं से कथित नजदीकी का दावा करते हुए मंत्रालयों में काम कराने के नाम पर लोगों से मोटी रकम वसूलने की दलाली में सक्रिय हैं।

पूर्व विधायक के पांच वर्षों के कार्यकाल की जांच हो तो अरबों का घोटाला मिलेगा 

सिहावा की जनता ने जिस विश्वास के साथ एक पूर्व विधायक को ऐतिहासिक मतों से जिताया था, उसी विश्वास को उन्होंने सत्ता के नशे में चूर होकर कुचल दिया। पाँच वर्षों में विकास के नाम पर भ्रष्टाचार का ऐसा तांडव मचा कि सिहावा के इतिहास में उसकी मिसाल नहीं मिलती। आदिवासी सीट से विधायक बनकर आदिवासी समाज के हक़ और सम्मान का खुला शोषण किया गया, एक ऐसा कलंक जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यही नहीं, 420 के मामले में अदालत तक को हस्तक्षेप करना पड़ा, और आज उनके पति का नाम छत्तीसगढ़ के शराब घोटाले में ईडी की चार्जशीट में दर्ज है।

यह तस्वीर बताने के लिए काफ़ी है कि राजनीति किस गर्त में जा चुकी है, जहाँ जनसेवा नहीं, व्यापार फल-फूल रहा है; जहाँ पाँच साल का जनादेश को आजीवन सत्ता का लाइसेंस समझ लिया जाता है। सत्ता की लत इतनी गहरी रही कि अंततः पार्टी ने भी टिकट काट दिया। यही है आज की राजनीति का कड़वा सच।

      दोहरा मापदंड लोकतंत्र के लिए खतरा

राजनीति सेवा है तो सुविधाओं का अंबार क्यों? पेशा है तो योग्यता-परीक्षा क्यों नहीं? यह दोहरापन नीतियों को निजी हितों का गुलाम बना देता है। नगरी सिहावा में पिछले पंचायत चुनावों में 40% से अधिक वादे अधूरे हैं। परिणामस्वरूप, ग्रामीण युवा बेरोजगार घूम रहे हैं, जबकि नेता महंगी गाड़ियों में नजर आते हैं।

     आत्ममंथन का समय

लोकतंत्र बचाने के लिए राजनीति में पारदर्शिता, योग्यता-मानदंड और सख्त जवाबदेही जरूरी है। जनता अब दर्शक नहीं, निर्णायक बने। नगरी सिहावा जैसे क्षेत्रों से संदेश साफ है: सेवा का मुखौटा उतारो, वरना व्यापार का अंत होगा। क्या पार्टियाँ सुधरेंगी? 



अंत में..ऐ पब्लिक है सब जानती है,अंदर क्या है बाहर क्या है ऐ सब कुछ पहचानतीं है.ऐ पब्लिक........





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