धान खरीदी व्यवस्था पर सवाल, टोकन के लिए भटकते रिसगांव के किसान

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धान खरीदी व्यवस्था पर सवाल, टोकन के लिए भटकते रिसगांव के किसान

‘एक-एक दाना खरीदने’ के सरकारी दावे की खुली पोल

कथनी–करनी के अंतर पर फिर उठे सवाल

सिहावा विधायक अंबिका मरकाम ने उठाई किसानों की आवाज़, धान खरीदी के लिए टोकन जारी करने की मांग


उत्तम साहू 

नगरी/धमतरी। प्रदेश सरकार द्वारा “एक-एक दाना धान खरीदने” के बड़े-बड़े दावे ज़मीनी हकीकत में खोखले साबित हो रहे हैं। धमतरी जिले के वनांचल और आदिवासी क्षेत्र के किसान आज भी धान बेचने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। टोकन व्यवस्था की बदहाली ने सरकार की खरीदी प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सिहावा विधानसभा क्षेत्र की विधायक अंबिका मरकाम ने ग्राम पंचायत रिसगांव के किसानों की पीड़ा को लेकर प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) नगरी को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।

38 किसानों को अब तक नहीं मिला पहला टोकन

आदिम जाति सेवा सहकारी समिति सांकरा उपार्जन केन्द्र, रिसगांव से जुड़े करीब 38 किसानों ने विधायक कार्यालय पहुंचकर बताया कि अब तक उनका प्रथम टोकन भी जारी नहीं किया गया है। टोकन नहीं मिलने के कारण धान तैयार होने के बावजूद किसान अपनी फसल बेच पाने में असहाय हैं।

सरकारी घोषणाओं और ज़मीनी व्यवस्था के बीच का यही फर्क आज किसानों की परेशानी की सबसे बड़ी वजह बन गया है।

कर्ज में डूबे किसान, बढ़ती आर्थिक तंगी

पीड़ित किसानों का कहना है कि खेती और घरेलू जरूरतों के लिए उन्होंने 40 से 50 हजार रुपये तक का कर्ज ले रखा है। धान की बिक्री नहीं होने से न सिर्फ कर्ज चुकाना मुश्किल हो गया है, बल्कि परिवार का गुजारा भी संकट में पड़ गया है।

धान खरीदी में देरी का सीधा असर किसानों की रोज़मर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी अब तक मौन साधे हुए हैं।

विधायक अंबिका मरकाम ने प्रशासन को घेरा

मामले की गंभीरता को देखते हुए विधायक अंबिका मरकाम ने एसडीएम नगरी को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि संलग्न सूची के अनुसार सभी किसानों की धान बिक्री की प्रक्रिया तत्काल सुनिश्चित की जाए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसानों के साथ किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल

यह मामला सिर्फ रिसगांव का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की धान खरीदी व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करता है। सवाल यह है कि जब सरकार “किसानों के हित” की बात करती है, तो फिर टोकन जैसी बुनियादी प्रक्रिया में इतनी लापरवाही क्यों?

अगर समय रहते समाधान नहीं हुआ, तो यह व्यवस्था किसानों का भरोसा पूरी तरह खो देगी।

अब देखना होगा कि प्रशासन सिर्फ कागज़ी आश्वासन देता है या वास्तव में खेत से खरीदी केंद्र तक की दूरी को कम करने के लिए ठोस कदम उठाता है।


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