धमतरी में ‘जल संरक्षण’ की पोल खुली: नहरों से निकला पानी, कॉलोनियों में घुसा सिस्टम का सच
उत्तम साहू
धमतरी। एक तरफ ‘माँ’ अभियान और ‘जल-जगार’ जैसे बड़े-बड़े दावे… दूसरी तरफ जमीनी हकीकत—लापरवाही की ऐसी बाढ़, जिसमें न सिर्फ पानी बहा बल्कि सिस्टम की जिम्मेदारी भी बहती नजर आई। जल संसाधन प्रबंध संभाग (कोड-38) की सुस्ती ने फौजी कॉलोनी को तालाब में बदल दिया, और खेतों में खड़ी फसलें पानी में सड़ गईं।
नहरों से निकला पानी, सड़कों पर बहा सिस्टम
कलेक्टर के स्पष्ट निर्देश थे—गंगरेल से छोड़ा गया निस्तारी पानी तालाबों तक पहुंचे, लेकिन विभाग ने कागजों में ही सफाई और निगरानी पूरी कर दी। हकीकत में नहरें कचरे और गाद से जाम थीं।
नतीजा—रातभर पानी कॉलोनियों में भरता रहा। सुबह फौजी कॉलोनी के घर-आंगन तालाब बन चुके थे, सड़कें नदी जैसी दिखीं।
स्थानीय रहवासी नितेश साहू, लोमेश देवांगन और विजय साहू का आरोप साफ है—“बार-बार चेतावनी दी, लेकिन विभाग सोता रहा। अब भुगतना हमें पड़ रहा है।”
‘जल-जगार’ के दावे बनाम जमीनी सच्चाई
‘नारी शक्ति से जल शक्ति’, ‘जल प्रहरियों’ और 400+ स्टॉप डैम के दावों के बीच यह सवाल खड़ा हो गया है—
👉 जब एक कॉलोनी को जलभराव से नहीं बचाया जा सकता, तो जल संरक्षण का मॉडल कैसे टिकेगा?
जो अभियान गंगरेल से देश-दुनिया तक पहचान बनाने का दावा कर रहे थे, वही अब विभागीय लापरवाही के नीचे दबते दिख रहे हैं।
जिम्मेदारों की चुप्पी, जवाब में अकड़
सबसे चौंकाने वाली बात—जब विभाग के वरिष्ठ अधिकारी से सवाल पूछा गया, तो जवाब जिम्मेदारी से ज्यादा अहंकार से भरा था।
“आपको क्या करना है… पैसा आप दिलवाओगे क्या… हमें दस काम हैं…” जैसे शब्द यह साफ करते हैं कि जनता की परेशानी उनके एजेंडे में कहीं नहीं है।
यह रवैया सिर्फ गैरजिम्मेदारी नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
प्रशासन अलर्ट या सिर्फ आश्वासन?
कलेक्टर अविनाश मिश्रा ने मामले में संज्ञान लेने और सुधार के निर्देश देने की बात कही है।
लेकिन सवाल वही है—
👉 क्या कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन हो जाएगा?
जनता का गुस्सा—अब चेतावनी में बदल रहा है
फौजी कॉलोनी के रहवासियों ने साफ कर दिया है—
अगर जल्द स्थायी समाधान नहीं मिला, तो आंदोलन होगा।
गर्मी के मौसम में जहां एक-एक बूंद पानी की कीमत है, वहां लाखों लीटर पानी की बर्बादी और घरों में घुसा जलभराव—यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का जिंदा उदाहरण है।
निष्कर्ष: नारे बनाम हकीकत
धमतरी में ‘जल संरक्षण’ अब दो तस्वीरों में बंट गया है—
एक, पोस्टर और मंचों पर गूंजते नारे
दूसरा, कॉलोनियों और खेतों में भरा पानी
अब देखना यह है कि जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है या फिर ‘जल-जगार’ सिर्फ एक और सरकारी जुमला बनकर रह जाता है।

