राजनीति: जनसेवा का मंच या सत्ता का सबसे बड़ा बाजार?
नगरी-सिहावा की सियासत में ‘सेवा’ के पीछे छिपे स्वार्थ का काला चेहरा
संपादक उत्तम साहू की कलम से
नगरी-सिहावा की राजनीति इन दिनों ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहाँ जनता के भरोसे से ज्यादा नेताओं की महत्वाकांक्षाएं बड़ी हो गई हैं। कभी यह क्षेत्र आदिवासी अस्मिता, सामाजिक संघर्ष और जनसेवा की पहचान माना जाता था, लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि राजनीति सेवा कम और सत्ता-संपत्ति का कारोबार ज्यादा नजर आने लगी है।
सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का माध्यम बनकर रह गया है? क्या जनता का विश्वास अब कुछ स्वार्थी तत्वों के लिए सिर्फ एक सीढ़ी भर है?
क्षेत्र में सक्रिय कई कथित छुटभैय्या नेताओं की भूमिका अब खुलकर चर्चा का विषय बन चुकी है। सत्ता की नजदीकियों का ढोल पीटकर कुछ लोग खुद को जनता का रहनुमा बताते हैं, लेकिन जमीन पर उनका असली खेल कमीशन, दलाली और संरक्षण की राजनीति से जुड़ा दिखाई देता है। मंत्रालयों में काम कराने, ठेके दिलाने, फाइल आगे बढ़वाने और नेताओं से कथित संबंधों का हवाला देकर आम लोगों से मोटी रकम वसूलना अब किसी से छिपा नहीं है।
विकास के नाम पर कमीशनखोरी का साम्राज्य
नगरी-सिहावा में विकास कार्यों की असली तस्वीर सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल स्थिति खुद बयान कर रही है। करोड़ों के प्रोजेक्ट आते हैं, लेकिन जमीन पर गुणवत्ता गायब दिखती है। कारण साफ है—ऊपर से नीचे तक कमीशन का ऐसा जाल फैल चुका है जिसमें विकास का पैसा बीच रास्ते ही दम तोड़ देता है।
आज हालत यह है कि किसी भी निर्माण कार्य में पहले कमीशन तय होता है, फिर काम। जनता पूछ रही है कि जब आधी रकम भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगी तो गुणवत्तापूर्ण विकास आखिर कैसे संभव होगा? यही वजह है कि कई निर्माण कुछ महीनों में ही जवाब दे देते हैं और जनता फिर उसी समस्या के बीच खड़ी मिलती है।
सत्ता का नशा और जनता के विश्वास की हत्या
सिहावा की जनता ने जिस भरोसे और उम्मीद के साथ अपने प्रतिनिधियों को ऐतिहासिक मतों से जिताया, वही भरोसा सत्ता के अहंकार में कुचलता नजर आया। पाँच वर्षों के कार्यकाल में भ्रष्टाचार, अवैध खनन, जमीन कब्जा, योजनाओं में गड़बड़ी और कथित आर्थिक अनियमितताओं के आरोप लगातार चर्चा में रहे।
राजनीति का सबसे दुखद पहलू तब सामने आता है जब आदिवासी समाज के नाम पर वोट लेने वाले ही आदिवासी हितों और सम्मान को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते दिखाई देते हैं। जनता आज भी पूछ रही है कि जिन वादों के साथ सत्ता मिली थी, उनका हिसाब कौन देगा?
क्षेत्र में यह चर्चा भी लगातार गर्म रही कि यदि बीते वर्षों के कार्यकाल की निष्पक्ष जांच हो जाए तो करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों के घोटालों की परतें खुल सकती हैं। अदालतों तक पहुंचे मामले और ईडी की कार्रवाई ने भी कई सवालों को जन्म दिया है।
यह वही राजनीति है जहाँ कभी जनसेवा का दावा किया गया था, लेकिन आज तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
भाजपा का नाम, निजी कारोबार का काम?
क्षेत्र के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और जागरूक नागरिकों का आरोप है कि कुछ स्वयंभू नेता भाजपा का चोला पहनकर निजी स्वार्थ साधने में लगे हुए हैं। बड़े नेताओं से करीबी का दावा कर ये लोग खुद को सत्ता का दलाल केंद्र बनाते जा रहे हैं। इससे न केवल पार्टी की छवि प्रभावित हो रही है, बल्कि ईमानदार कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट रहा है।
सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दल ऐसे तत्वों पर कार्रवाई करने का साहस दिखाएंगे? या फिर चुनावी गणित और धनबल के आगे नैतिकता हमेशा की तरह हारती रहेगी?
लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
राजनीति जब सेवा छोड़कर व्यापार बन जाती है, तब लोकतंत्र धीरे-धीरे खोखला होने लगता है। जनता केवल वोट बैंक बनकर रह जाती है और नेता सत्ता को निजी साम्राज्य समझने लगते हैं। नगरी-सिहावा की स्थिति आज इसी खतरे की ओर इशारा कर रही है।
जरूरत अब आत्ममंथन की है।
जरूरत जवाबदेही की है।
जरूरत उन चेहरों को पहचानने की है जो सेवा का मुखौटा पहनकर जनता की उम्मीदों का सौदा कर रहे हैं।
जनता अब पहले जैसी नहीं रही। वह सब देख रही है, समझ रही है और सही समय का इंतजार भी कर रही है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता ही है और जब जनता फैसला करती है तो सत्ता के सबसे मजबूत किले भी ढह जाते हैं।
अंत में बस इतना “ऐ पब्लिक है… ये सब जानती है।
चेहरों के पीछे छिपे चेहरे भी पहचानती है।”

