अब “सरपंच पति” नहीं चलाएंगे पंचायत! महिला प्रतिनिधियों को मिलेगा असली अधिकार

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अब “सरपंच पति” नहीं चलाएंगे पंचायत! महिला प्रतिनिधियों को मिलेगा असली अधिकार



रायपुर/ पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए बड़ा फैसला लिया है। अब पंचायत बैठकों में निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधियों की जगह उनके पति, रिश्तेदार या किसी अन्य व्यक्ति की मौजूदगी मान्य नहीं होगी।

विभाग ने साफ कहा है कि पंचायतों में महिलाओं को मिला आरक्षण केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में उनकी सीधी और प्रभावी भागीदारी के लिए है। इसी उद्देश्य से ग्राम पंचायत, जनपद और जिला पंचायत की बैठकों में महिला प्रतिनिधियों की उपस्थिति अनिवार्य की जा रही है।

बायोमीट्रिक और फेस रिकॉग्निशन से होगी निगरानी

महिला प्रतिनिधियों की वास्तविक मौजूदगी सुनिश्चित करने के लिए अब तकनीक का सहारा लिया जाएगा। जरूरत पड़ने पर फेस रिकॉग्निशन और बायोमीट्रिक अटेंडेंस सिस्टम लागू किया जाएगा, ताकि किसी भी तरह के “प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व” पर रोक लगाई जा सके।

डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड होगी हर कार्रवाई

पंचायत बैठकों और ग्राम सभाओं की पूरी जानकारी अब सभासार पोर्टल, निर्णय ऐप और अन्य अधिकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपलोड की जाएगी। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और यह भी रिकॉर्ड रहेगा कि महिला प्रतिनिधि कितनी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

महिला नेताओं को मिलेगा प्रशिक्षण

विभाग ने जिला स्तर पर जेंडर सेंसिटाइजेशन कार्यक्रम, नेतृत्व प्रशिक्षण और जागरूकता शिविर आयोजित करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, बेहतर काम करने वाली महिला जनप्रतिनिधियों की सफलता की कहानियों को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से प्रचारित किया जाएगा, ताकि दूसरी महिलाओं को भी आगे आने की प्रेरणा मिले।

पेसा क्षेत्रों में महिला सभा होगी जरूरी

क्षेत्रों की पंचायतों में ग्राम सभा से पहले महिला सभा आयोजित करना अनिवार्य किया गया है। वहीं सामान्य क्षेत्रों में भी महिला प्रतिनिधियों को खुलकर अपनी बात रखने के लिए महिला सभाओं को बढ़ावा दिया जाएगा।

शिकायतों पर होगी सख्ती

प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व से जुड़ी शिकायतों के लिए पंचायत स्तर से लेकर जिला स्तर तक शिकायत पेटी और प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र विकसित किया जाएगा। अधिकारियों को समयबद्ध कार्रवाई के लिए जवाबदेह बनाया गया है।

सरकार के इस कदम को पंचायतों में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी और “सरपंच पति संस्कृति” पर लगाम लगाने की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।

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