'विकसित भारत' के दावों के बीच वनांचल की कड़वी हकीकत, पेड़ के नीचे स्कूल और लकड़ी के पुल से गुजर रही जिंदगी
सरकारी योजनाओं के दावों पर उठे सवाल, आखिर कब पहुंचेगा विकास खल्लारी और रिसगांव के जंगलों तक?
उत्तम साहू,नगरी। एक ओर सरकारें विकसित भारत, अमृतकाल और गांव-गांव विकास की बातें कर रही हैं, वहीं धमतरी जिले के नगरी विकासखंड का वनांचल क्षेत्र आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। यहां के कई गांव ऐसे हैं, जहां सड़क, पुल, स्कूल, बिजली और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं आज भी लोगों की पहुंच से दूर हैं। सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर यहां साफ नजर आता है।
22 जून को इसी उपेक्षा से नाराज हजारों ग्रामीण अपनी मांगों को लेकर धमतरी कलेक्टर कार्यालय पहुंचे। प्रशासन ने आश्वासन तो दिया, लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से उन्हें केवल भरोसा ही मिला है, सुविधाएं नहीं।
ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान ग्राम पंचायत खल्लारी के आश्रित गांव गाताबहारा सहित वनांचल के कई गांवों में जो तस्वीर सामने आई, वह चौंकाने वाली थी। यहां बच्चों के लिए स्कूल भवन तक नहीं है। मासूम विद्यार्थी पेड़ की छांव और अस्थायी झोपड़ी में पढ़ाई करने को मजबूर हैं। बरसात और गर्मी दोनों में यही उनकी कक्षा बन जाती है।
रिसगांव की ओर बढ़ने पर हालात और भी गंभीर नजर आए। नदी-नालों पर पुल-पुलिया नहीं होने से ग्रामीणों ने अपने श्रम और संसाधनों से लकड़ी का अस्थायी पुल तैयार किया है। इसी पुल से रोज लोग आवागमन करते हैं। बरसात में यही पुल हादसों का कारण बन सकता है, लेकिन वर्षों से स्थायी समाधान नहीं हो सका।
बिजली की सुविधा अब भी कई गांवों तक नहीं पहुंची है। स्वास्थ्य सेवाएं भी बदहाल हैं। किसी के बीमार होने पर कई किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है। ग्रामीणों का आरोप है कि हर बार उनकी मांगों को टाइगर रिजर्व के नियमों का हवाला देकर टाल दिया जाता है, जबकि चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इन गांवों तक स्कूल, सड़क, पुल, बिजली और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं, तो विकास के दावे किसके लिए किए जा रहे हैं? क्या वनांचल के नागरिक विकास की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं हैं?
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं, तो आने वाले समय में इससे भी बड़ा जनआंदोलन किया जाएगा।
अब निगाहें शासन और प्रशासन पर हैं। क्या इस बार आश्वासन से आगे बढ़कर जमीन पर काम दिखाई देगा, या फिर वनांचल के इन गांवों की पीड़ा एक बार फिर सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएगी?

