धमतरी का औषधीय खेती मॉडल बना देश के लिए प्रेरणा

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धमतरी का औषधीय खेती मॉडल बना देश के लिए प्रेरणा

अनुपयोगी भूमि पर उगी समृद्धि की नई फसल, 150 एकड़ की सफलता के बाद 500 एकड़ विस्तार का लक्ष्य

महिला स्व-सहायता समूहों ने लिखी आत्मनिर्भरता की नई कहानी, औषधीय एवं सुगंधीय फसलों से बढ़ी ग्रामीण अर्थव्यवस्था


उत्तम साहू 

धमतरी, 20 जुलाई 2026। कभी अनुपयोगी मानी जाने वाली भूमि पर आज औषधीय पौधों की हरियाली लहरा रही है। जिन महिला स्व-सहायता समूहों की आय पहले पारंपरिक खेती तक सीमित थी, वे अब औषधीय एवं सुगंधीय फसलों की खेती के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त होकर आत्मनिर्भरता की नई कहानी लिख रही हैं। धमतरी जिले का यह अभिनव मॉडल अब केवल जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में ग्रामीण विकास, महिला सशक्तिकरण और कृषि नवाचार की मिसाल बन चुका है।

धमतरी कृषि प्रधान जिला है और यहां बड़ी आबादी धान आधारित खेती पर निर्भर है। हालांकि धान उत्पादन जिले की प्रमुख पहचान है, लेकिन सीमित आय, प्राकृतिक जोखिम और बड़ी मात्रा में अनुपयोगी भूमि लंबे समय से चुनौती बनी हुई थी। महानदी के किनारे की रेतीली भूमि, कटाव प्रभावित क्षेत्र और कम उत्पादक भूमि को आय के नए स्रोत में बदलने की दिशा में जिला प्रशासन ने पहल की।

         अनुपयोगी भूमि को बनाया आय का साधन



वर्ष 2025 में कलेक्टर अबिनाश मिश्रा के मार्गदर्शन में जिला प्रशासन ने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) और राज्य औषधीय पादप बोर्ड के सहयोग से औषधीय एवं सुगंधीय फसलों के कृषिकरण की अभिनव पहल शुरू की। इस पहल का उद्देश्य केवल खेती को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि महिला स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और अनुपयोगी भूमि का बेहतर उपयोग करना था।

योजना के तहत जिले का विस्तृत सर्वेक्षण कर अनुपयोगी, रेतीली और कम उत्पादक भूमि की पहचान की गई। इसके बाद महिला स्व-सहायता समूहों को अभियान से जोड़ा गया। खस, ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली जैसी उच्च मूल्य वाली फसलों की गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री उपलब्ध कराई गई। महिलाओं को विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया। योजना की सबसे बड़ी विशेषता शत-प्रतिशत बाय-बैक व्यवस्था रही, जिससे उत्पादों के विपणन की चिंता भी दूर हो गई।

               150 एकड़ से शुरू हुआ बदलाव



प्रथम चरण में करीब 150 एकड़ क्षेत्र में 200 महिला स्व-सहायता समूह सदस्यों को जोड़ा गया। लगभग 80 एकड़ में खस, 20 एकड़ में ब्राह्मी, 10 एकड़ में बच तथा 40 एकड़ में लेमनग्रास, पामारोजा और पचौली की खेती की गई।

इस पहल के परिणाम भी जल्द सामने आने लगे। जो भूमि पहले आर्थिक रूप से अनुपयोगी मानी जाती थी, वहीं से प्रति एकड़ करीब एक लाख रुपये तक की आय प्राप्त होने लगी। महिलाओं ने इस आय का उपयोग बच्चों की शिक्षा, परिवार की आवश्यकताओं, कृषि उपकरणों की खरीद और छोटे व्यवसाय शुरू करने में किया।

इससे न केवल परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, बल्कि महिलाओं में निर्णय लेने का आत्मविश्वास और सामाजिक सहभागिता भी बढ़ी।

           महिलाओं की बदली आर्थिक तस्वीर



आदर्श महिला कृषक समूह कंडेल की सत्या ढीमर बताती हैं कि पहले उनकी आय मुख्य रूप से धान की खेती पर निर्भर थी। औषधीय खेती की जानकारी नहीं थी, लेकिन प्रशिक्षण, पौध सामग्री और खरीदी की सुनिश्चित व्यवस्था ने महिलाओं का भरोसा बढ़ाया। आज औषधीय खेती उनके लिए आय का मजबूत माध्यम बन चुकी है।

समूह की पूना साहू और श्रीमती कुंती ढीमर का कहना है कि इस योजना ने केवल आय में वृद्धि नहीं की, बल्कि महिलाओं को बैंकिंग, समूह प्रबंधन और उद्यमिता के क्षेत्र में भी आगे बढ़ाया है। अब महिलाएं स्वयं निर्णय लेने के साथ-साथ अन्य महिलाओं को भी इस दिशा में प्रेरित कर रही हैं।

किसान अशोक नेताम के अनुसार, कम पानी वाली भूमि में लेमनग्रास और खस जैसी फसलें काफी सफल साबित हुई हैं। इसके बाद जिले के अनेक किसान पारंपरिक खेती के साथ औषधीय खेती को भी अपनाने लगे हैं।

        ‘लखपति दीदी’ अभियान को मिली नई गति   



महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘लखपति दीदी’ अभियान को भी धमतरी के औषधीय खेती मॉडल से नई गति मिली है। कृषि, वनोपज, पशुपालन और ग्रामीण उद्यमिता को एकीकृत कर महिला स्व-सहायता समूहों को आय के स्थायी स्रोतों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

धमतरी मॉडल में महिलाओं को केवल उत्पादक नहीं, बल्कि भविष्य की ग्रामीण उद्यमी के रूप में तैयार किया जा रहा है।

खेती से आगे बढ़कर पूरी वैल्यू चेन पर जोर

धमतरी मॉडल की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें केवल उत्पादन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा, बल्कि पूरी वैल्यू चेन विकसित करने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

कुरूद विकासखंड के कोटगांव और पचपेड़ी में औषधीय पौधों की नर्सरी विकसित की जा रही है। इससे स्थानीय स्तर पर गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री उपलब्ध होगी। भविष्य में प्रसंस्करण, आवश्यक तेल निष्कर्षण, पैकेजिंग और मूल्य संवर्धन की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है।

यदि स्थानीय स्तर पर छोटे प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित होते हैं, तो इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, परिवहन लागत कम होगी और किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिल सकेगा।

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

धमतरी के इस नवाचार को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहना मिली है। 9 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली में आयोजित महाकुंभ-2025 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और कृषि जागरण के संयुक्त मंच पर जिले को औषधीय एवं सुगंधीय पौधों के कृषिकरण में उत्कृष्ट कार्य के लिए राष्ट्रीय सम्मान प्रदान किया गया।

इसके बाद हैदराबाद, बिहार और मध्यप्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के किसान, अधिकारी और संस्थाएं धमतरी पहुंचकर इस मॉडल का अध्ययन कर चुके हैं। अब धमतरी का औषधीय खेती मॉडल देश के अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है।

500 एकड़ तक विस्तार का लक्ष्य

पहले चरण की सफलता के बाद अब इस पहल को 500 एकड़ तक विस्तारित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके माध्यम से 500 से अधिक महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

राज्य औषधीय पादप बोर्ड, कृषि विभाग, उद्यानिकी विभाग, बिहान और अन्य विभागों के समन्वय से जिले के चारों विकासखंडों में प्रशिक्षण, कार्यशालाएं और तकनीकी सहायता दी जा रही है, ताकि अधिक से अधिक किसान और महिला समूह इस अभियान से जुड़ सकें।

आर्थिक समृद्धि के साथ पर्यावरण संरक्षण

औषधीय खेती का लाभ केवल आय बढ़ाने तक सीमित नहीं है। ब्राह्मी, बच, लेमनग्रास और अन्य औषधीय एवं सुगंधीय पौधे भूमि संरक्षण, हरित आवरण बढ़ाने, जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में भी सहायक हैं।

इस तरह धमतरी का मॉडल आर्थिक समृद्धि के साथ पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ कृषि का भी उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है।

गांव की महिलाओं से लिखी जा रही विकास की नई कहानी

धमतरी का औषधीय खेती मॉडल यह साबित करता है कि विकास केवल बड़े उद्योगों और शहरों तक सीमित नहीं है। यदि स्थानीय संसाधनों, वैज्ञानिक तकनीक, प्रशासनिक इच्छाशक्ति और महिला शक्ति को एक साथ जोड़ा जाए, तो गांवों में भी आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है।

आज धमतरी की अनुपयोगी भूमि पर लहलहाती औषधीय फसलें केवल खेती का विस्तार नहीं, बल्कि सशक्त महिलाओं, आत्मनिर्भर किसानों, समृद्ध गांवों और विकसित छत्तीसगढ़ की नई तस्वीर प्रस्तुत कर रही हैं। 150 एकड़ से शुरू हुई यह पहल अब 500 एकड़ के लक्ष्य की ओर बढ़ रही है और आने वाले समय में देश के अन्य जिलों के लिए भी एक प्रभावी ग्रामीण विकास मॉडल साबित हो सकती है।

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