अजोला ने बदली बिहान दीदियों की जिंदगी, प्राकृतिक खेती और आजीविका का बना आधार
अमाली की आदिवासी महिलाओं ने वैज्ञानिक तरीके से अजोला उत्पादन कर पेश की आत्मनिर्भरता की मिसाल
उत्तम साहू
नगरी,धमतरी, 27 जुलाई 2026। तालाबों और जलाशयों में उगने वाली अजोला को अक्सर साधारण जलीय वनस्पति समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन नगरी विकासखंड के ग्राम पंचायत अमाली की आदिवासी बिहान स्व-सहायता समूह की महिलाओं ने इसी अजोला को आजीविका, प्राकृतिक खेती और आत्मनिर्भरता का सशक्त माध्यम बना दिया है। प्रशिक्षण, वैज्ञानिक सोच और सामूहिक प्रयासों से शुरू हुई यह पहल अब ग्रामीण अर्थव्यवस्था और महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल बनकर सामने आ रही है।
ग्राम पंचायत अमाली की कृषि सखी एवं बिहान समूह की सदस्य श्रीमती अनिता बाई मरकाम ने प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अपने घर में छोटे-छोटे टैंकों में अजोला का उत्पादन शुरू किया। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्हें अजोला के उपयोग और उत्पादन की जानकारी नहीं थी। प्रशिक्षण के बाद पशु चिकित्सा विभाग से अजोला का कल्चर प्राप्त कर उन्होंने वैज्ञानिक विधि से इसका उत्पादन शुरू किया। नियमित देखभाल और साफ-सफाई के जरिए आज वे लगभग 25 किलोग्राम अजोला तैयार कर चुकी हैं और भविष्य में इसका उत्पादन बढ़ाने की योजना है।
समूह द्वारा तैयार किए जा रहे अजोला का उपयोग धान की खेती में जैविक पूरक के रूप में किया जा रहा है। अजोला मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने, नमी संरक्षण और पौधों को आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने में सहायक है। इसके उपयोग से रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने में मदद मिल रही है।
अजोला का उपयोग पशुपालन, मत्स्य पालन और कुक्कुट पालन में भी पौष्टिक पूरक आहार के रूप में किया जा रहा है। समूह की महिलाएं अपने पशुओं को अजोला खिलाने के साथ-साथ खेती में भी इसका उपयोग कर रही हैं। कम लागत में उपलब्ध यह स्थानीय संसाधन उत्पादन लागत कम करने और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में सहायक बन रहा है।
श्रीमती अनिता बाई मरकाम बताती हैं कि कभी अजोला उनके लिए केवल एक नई जानकारी थी, लेकिन आज यही उनके परिवार, समूह की अन्य महिलाओं और आसपास के किसानों के लिए उपयोगी संसाधन बन गया है। अजोला उत्पादन से उन्हें आर्थिक लाभ के साथ प्राकृतिक खेती अपनाने का आत्मविश्वास भी मिला है।
बिहान समूह की महिलाओं का कहना है कि जिस अजोला को पहले महत्वहीन समझा जाता था, वही आज उनके लिए आजीविका का नया आधार बन गया है। प्रशिक्षण, सामूहिक प्रयास और नवाचार की सोच ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने का अवसर दिया है। अब समूह द्वारा जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्माण की दिशा में भी कार्य करने की तैयारी की जा रही है। इस पहल में चेतन कुमार नेताम और तुषार यादव ने भी सहयोग प्रदान किया है।
ग्राम पंचायत अमाली की यह पहल साबित करती है कि स्थानीय संसाधनों का वैज्ञानिक और नवाचारी उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और किसानों की लागत में कमी जैसे अनेक सकारात्मक परिणाम इस मॉडल से सामने आ रहे हैं। अमाली की बिहान दीदियों की यह पहल महिला सशक्तिकरण, प्राकृतिक कृषि और आत्मनिर्भर ग्रामीण विकास की दिशा में एक प्रेरक सफलता की कहानी बनकर उभरी है।

