'लापरवाही' का काला दाग: जब तड़पती रही गर्भवती, तो घर पर आराम फरमाती रहीं मैडम CHO
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| प्रतीकात्मक फोटो |
उत्तम साहू,नगरी/ गोरेगांव: सरकारें भले ही 'संस्थागत प्रसव' और 'सुरक्षित मातृत्व' के बड़े-बड़े विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने रंगती रहें, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी किसी खौफनाक मंजर से कम नहीं है। ताजा मामला नगरी क्षेत्र के ग्राम गोरेगांव का है, जहां स्वास्थ्य तंत्र की घोर संवेदनहीनता के कारण एक गर्भवती महिला की जान दांव पर लग गई।
जब एक मां प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी, तब जिम्मेदारी का चोला ओढ़े बैठी शासकीय उप स्वास्थ्य केंद्र की कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (CHO) अपनी ड्यूटी भूलकर घर पर आराम फरमा रही थीं।
सब कुछ पता था, फिर भी नहीं पसीजा दिल
हैरानी की बात तो यह है कि पीड़ित महिला (डीगेश्वर मरकाम की पत्नी) के प्रसव की पूरी जानकारी इस CHO महोदया को पहले से ही थी। सुबह जैसे ही महिला को तेज प्रसव पीड़ा शुरू हुई, परिजनों ने तुरंत उप स्वास्थ्य केंद्र की CHO को सूचित किया। लेकिन मैडम के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। महिला दर्द से छटपटाती रही, चीखती रही, लेकिन स्वास्थ्य कर्मी मौके पर नहीं पहुंचीं।
अस्पताल के बदले घर और एम्बुलेंस में हुआ जुड़वां बच्चों का जन्म
तड़पते हुए महिला ने घर पर ही अपने पहले बच्चे को जन्म दे दिया।उलझा रहा नाल (नार):पहले बच्चे के जन्म के बाद नवजात का नाल (जो माता के गर्भाशय से जुड़ा रहता है) काटने वाला कोई नहीं था। इस वजह से तड़पती मां और नवजात बच्चे को 102 एम्बुलेंस तक ले जाना भी दूभर हो गया।
किसी तरह जब महिला को 102 एम्बुलेंस से स्वास्थ्य केंद्र ले जाने का प्रयास किया जा रहा था, इसी आपाधापी के बीच उसने दूसरे बच्चे को भी जन्म दे दिया।
"सुबह आई थी, अब घर में हूँ..." – ये है मैडम का जवाब
उप सरपंच जीवन यादव ने जब इस घोर लापरवाही पर फोन करके CHO से जवाब मांगा, तो मैडम का गैर-जिम्मेदाराना जवाब सुनिए— "सुबह 7 बजे मैं अस्पताल आई थी, अब मैं घर में हूं।"
वाह मैडम! क्या ऑन-ड्यूटी होने का मतलब सिर्फ हाजिरी लगाना है? एक तरफ सुबह 7 बजे से 9 बजे के बीच महिला दो बच्चों को जन्म देकर जिंदगी और मौत से जूझती रही और स्वास्थ्य कर्मी अपने घर में समय काट रही थीं।
लंबे इंतजार के बाद पहुंचीं, तब तक बिगड़ चुकी थी हालत
जब दोनों बच्चों का जन्म हो चुका था और काफी लंबा वक्त बीत गया, तब जाकर CHO महोदया ने घटनास्थल पर कदम रखने की जहमत उठाई। महिला की गंभीर स्थिति को देखते हुए उसे आनन-फानन में नगरी शासकीय स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहाँ सुबह करीब 9:30 से 10 बजे के बीच उसे भर्ती कराया जा सका।
ग्रामीणों में भारी आक्रोश, कार्रवाई की मांग
इस पूरे घटनाक्रम से गोरेगांव के ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। ग्रामीणों का सीधा कहना है कि CHO की इस गंभीर लापरवाही की वजह से जच्चा और बच्चा दोनों की जान जा सकती थी। अब देखना यह है कि इस "सरकारी सुस्ती" और संवेदनहीनता पर उच्च अधिकारी क्या कार्रवाई करते हैं, या फिर इस मामले को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

