11 साल से कागजों में दफन आदेश, आखिर किस हादसे का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
कलेक्टर-एसडीएम के आदेश की खुलेआम अवहेलना, जर्जर सरकारी क्वार्टरों में अवैध कब्जा कर आज भी रह रहे दैनिक वेतन परिवार
उत्तम साहू,नगरी
नगरी/ रानी दुर्गावती वार्ड नं 6 ब्लॉक कॉलोनी में आदिमजाति कल्याण विभाग/जनपद पंचायत/राजस्व विभाग के लगभग 20 जर्जर शासकीय आवासों को वर्ष 2015 में तत्कालीन कलेक्टर और एसडीएम ने "अतिशीघ्र डिस्मेंटल" करने का आदेश दिया था। संयुक्त जांच प्रतिवेदन में साफ लिखा गया था कि ये भवन कभी भी गिर सकते हैं और जन-धन की हानि हो सकती है। लेकिन 11 वर्ष बीत जाने के बाद भी आदेश फाइलों में कैद है और अधिकारी गहरी नींद में हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रशासन स्वयं इन भवनों को "खतरनाक" घोषित कर चुका है, तब भी विभाग के कर्मचारी द्वारा मौखिक आदेश के चलते प्राइवेंट कंपनी के वाहन चालक भी अवैध कब्जा कर शासन के आदेशों को चुनौती दे रहे हैं जिनको पूर्व में अनुविभागीय अधिकारी राजस्व ने नोटिस देकर अवैध कब्जा खाली करने कहा था उसके बाद भी आज तक खाली नही किया गया हैं, सभी जर्जर मकानों में नगर पंचायत नगरी से नल कनेक्शन,बिजली विभाग से मीटर जारी कर शासन को ठेंगा दिखा रहे हैं अब सवाल उठता है कि आखिर दैनिक वेतन कर्मचारियों /108 वाहन चालकों और उनके परिवारों की जान जोखिम में डालने की अनुमति किसने दी? यदि कल कोई दीवार या छत गिरने से किसी मासूम की जान चली जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? संबंधित अधिकारी, विभाग या फिर पूरा प्रशासन?
यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी आदेशों की खुली अवहेलना और जनता की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ है। प्रशासन तब तक नहीं जागता, जब तक कोई बड़ा हादसा न हो जाए? क्या हर बार कार्रवाई के लिए किसी की मौत जरूरी है?
विडंबना यह है कि तत्कालीन कलेक्टर भीम सिंह और एसडीएम संदीप कुमार अग्रवाल के स्पष्ट आदेश के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने पालन कराना जरूरी नहीं समझा। इससे साफ संकेत मिलता है कि विभाग में जवाबदेही और निगरानी की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। क्या प्रशासन किसी और त्रासदी का इंतजार कर रहा है?
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय लगातार सुशासन, जवाबदेही और पारदर्शिता की बात कर रहे हैं। ऐसे में धमतरी जिला प्रशासन को इस मामले में तत्काल संज्ञान लेते हुए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करनी चाहिए। वर्षों से आदेश की अवहेलना करने वाले अधिकारियों पर कठोर विभागीय कार्रवाई होनी चाहिए और जर्जर भवनों को तत्काल खाली कराकर डिस्मेंटल कराया जाना चाहिए।
अब सवाल जनता का है— आखिर 11 साल तक सरकारी आदेश को ठंडे बस्ते में डालने वालों पर कार्रवाई कब होगी? या फिर प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा




