नगरी जनपद सीईओ की पदस्थापना पर उठे सवाल, नियमों को दरकिनार कर जनपद में नियुक्तियां?
उत्तम साहू,नगरी। धमतरी जिले के आदिवासी विकासखंड नगरी की जनपद पंचायत इन दिनों प्रशासनिक व्यवस्थाओं और नियुक्तियों को लेकर विवादों के केंद्र में आ गई है। जनपद पंचायत में नियमों और प्रावधानों की अनदेखी कर अधिकारियों की पदस्थापना किए जाने के आरोप लग रहे हैं। अब इस मामले में क्षेत्र के आदिवासी जनप्रतिनिधियों ने खुलकर विरोध दर्ज कराते हुए शासन और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
आरोप है कि आदिवासी बाहुल्य एवं अनुसूचित क्षेत्र घोषित नगरी विकासखंड में शासन के निर्धारित नियमों के विपरीत पंचायत विभाग के एक अधिकारी को जनपद पंचायत का मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) नियुक्त कर दिया गया है। जबकि जनप्रतिनिधियों का कहना है कि अनुसूचित एवं ट्राइबल ब्लॉकों में आदिवासी विकास विभाग अथवा निर्धारित पात्र विभाग के अधिकारियों को ही इस महत्वपूर्ण पद पर पदस्थ किए जाने का प्रावधान है।
मामले को लेकर सवाल केवल सीईओ की नियुक्ति तक सीमित नहीं हैं। जनपद पंचायत कार्यालय में एक पंचायत सचिव को मुख्य लेखापाल जैसे महत्वपूर्ण वित्तीय पद की जिम्मेदारी सौंपे जाने पर भी आपत्ति जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि संबंधित पंचायत सचिव अभी परिवीक्षा अवधि में हैं, इसके बावजूद उन्हें वित्तीय कार्यों की जवाबदेही सौंप दी गई है। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता और वित्तीय प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
आरोप है कि उक्त सीईओ पिछले लगभग डेढ़ वर्ष से जनपद पंचायत में नियमों की अनदेखी कर कार्य किया जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार वरिष्ठ अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं। कई जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि अनुसूचित क्षेत्रों के लिए विशेष प्रावधान बनाए गए हैं तो उनका पालन भी सुनिश्चित होना चाहिए। अन्यथा आदिवासी क्षेत्रों के अधिकारों और संवैधानिक व्यवस्थाओं का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा।
जनप्रतिनिधियों का यह भी कहना है कि शासन एक ओर आदिवासी क्षेत्रों के संरक्षण, संवर्धन और प्रशासनिक भागीदारी की बात करता है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं क्षेत्रों में नियमों को नजरअंदाज कर नियुक्तियां की जा रही हैं। इससे स्थानीय जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों में असंतोष बढ़ रहा है।
फिलहाल यह मामला प्रशासनिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सभी की निगाहें जिला प्रशासन और राज्य शासन पर टिकी हुई हैं कि वे इन आरोपों की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करते हैं या नहीं। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल एक नियुक्ति विवाद नहीं, बल्कि आदिवासी क्षेत्रों में लागू विशेष प्रशासनिक प्रावधानों की अनदेखी का गंभीर उदाहरण बन सकता है।

