उदन्ती-सीतानदी टाइगर रिजर्व ने की जनसहयोग की अपील: विकास कार्यों के समय पारिस्थितिक महत्व और कानूनी स्थिति को ध्यान में रखने का आग्रह

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 उदन्ती-सीतानदी टाइगर रिजर्व ने की जनसहयोग की अपील: विकास कार्यों के समय पारिस्थितिक महत्व और कानूनी स्थिति को ध्यान में रखने का आग्रह



                 विशेष संवाददाता उतम साहू 

गरियाबंद-धमतरी (छत्तीसगढ़) उदन्ती-सीतानदी टाइगर रिजर्व (यूएसटीआर) प्रशासन ने क्षेत्र के समस्त निवासियों, जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों और अन्य हितधारकों से एक विनम्र अपील जारी की है। रिजर्व के उप संचालक द्वारा जनहित में जारी इस विज्ञप्ति में कहा गया है कि संरक्षित क्षेत्र के भीतर पारंपरिक विद्युत अवसंरचना, पक्की सड़कों तथा अन्य गैर-वानिकी विकास कार्यों से संबंधित मांगों पर विचार करते समय इस क्षेत्र के असाधारण पारिस्थितिक महत्व और इसकी संवेदनशील कानूनी स्थिति को अनिवार्य रूप से ध्यान में रखा जाना चाहिए।

 मध्य भारत की अमूल्य पारिस्थितिक धरोहर

विज्ञप्ति के अनुसार, उदन्ती-सीतानदी टाइगर रिजर्व केवल एक वन क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह मध्य भारत की सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक धरोहरों में से एक है। यह महानदी, सोंढूर, पैरी एवं तेल जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम तथा जलग्रहण क्षेत्र है, जिन पर छत्तीसगढ़ और ओडिशा के लाखों लोगों की जल सुरक्षा निर्भर करती है। इसके साथ ही यह क्षेत्र भूजल पुनर्भरण, जलवायु संतुलन, मृदा संरक्षण और कार्बन अवशोषण जैसी अमूल्य सेवाएं प्रदान करता है।

यह टाइगर रिजर्व एशियाई हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, मालाबार पाइड हॉर्नबिल, स्मूथ-कोटेड ऊदबिलाव, भारतीय विशाल गिलहरी, भारतीय उड़न गिलहरी, वन भैंसा जैसी अनेक दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियों का महत्वपूर्ण आवास है। यह परिदृश्य छत्तीसगढ़ और ओडिशा के वनों को जोड़ने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारा (वाइल्डलाइफ कॉरिडोर) भी है।

 मानव-वन्यजीव संघर्ष: जनसुरक्षा का विषय

देशभर के वैज्ञानिक अध्ययनों के हवाले से बताया गया है कि वन्यजीव आवासों के भीतर सड़क, विद्युत लाइन, स्थायी निर्माण, अतिक्रमण और मानवीय गतिविधियों का विस्तार वनों को खंडित करता है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है क्योंकि ऐसे व्यवधान हाथियों, भालुओं और तेंदुओं को गांवों तथा कृषि क्षेत्रों के निकट आने के लिए विवश करते हैं।

वर्तमान में उदन्ती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में 50 से अधिक हाथी, लगभग 200 तेंदुए तथा 1000 से अधिक भालू निवास करते हैं। विभागीय प्रयासों, स्थानीय समुदायों के सहयोग और आधुनिक तकनीक (जैसे कि टाइगर रिजर्व द्वारा विकसित "छत्तीसगढ़ एलीफेंट ट्रैकिंग एंड अलर्ट एप") के उपयोग से इस संघर्ष को नियंत्रित रखा गया है। पिछले चार वर्षों में यहाँ औसतन केवल एक मानव मृत्यु प्रतिवर्ष दर्ज की गई है। इस नवाचार की सफलता को देखते हुए इसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, झारखंड और कर्नाटक सहित कई राज्यों द्वारा अपनाया गया है।

प्रशासन ने चेतावनी दी है कि वन्यजीव आवासों में किसी भी प्रकार का व्यापक हस्तक्षेप इन उपलब्धियों को प्रभावित कर सकता है जिससे ग्रामीणों को भारी जोखिम का सामना करना पड़ सकता है।

 कानूनी एवं न्यायिक दायित्व

टाइगर रिजर्व का प्रबंधन वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के दिशा-निर्देशों तथा माननीय न्यायालयों के आदेशों के अनुरूप किया जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश: माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने टी.एन. गोदावर्मन तिरुमुलपाद जनहित याचिका (क्रमांक 202/1995) में 13.02.2012 को पारित आदेश के माध्यम से उदन्ती वन्यजीव अभयारण्य को छत्तीसगढ़ के राज्य पशु 'वन भैंसा' के आवासों एवं वन क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा संरक्षित क्षेत्रों में अतिक्रमण व पारिस्थितिक क्षरण को रोकने हेतु निर्देशित किया है।

उच्च न्यायालय का रुख: इसी प्रकार माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़, बिलासपुर ने जनहित याचिका क्रमांक 33/2012 (नितिन सिंहवी बनाम भारत संघ एवं अन्य) में 27.08.2018 को आदेश पारित कर टाइगर रिजर्व क्षेत्रों के भीतर 'प्रधानमंत्री आवास योजना' के विस्तार पर रोक लगाने के निर्देश दिए हैं और ग्राम पुनर्वास की प्रक्रिया को विधि अनुसार शीघ्र पूर्ण करने को कहा है।

अवसंरचना परियोजनाओं में संवेदनशीलता: राष्ट्रीय स्तर पर भी इस संवेदनशीलता को स्वीकार किया गया है। सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण 'रायपुर-विशाखापट्टनम आर्थिक गलियारा' (भारतमाला परियोजना) को टाइगर रिजर्व क्षेत्र से बाहर पुनर्संरेखित (Re-align) किया गया है ताकि वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

 अतिक्रमण एवं अवैध गतिविधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई

विज्ञप्ति के अनुसार राजापड़ाव, शोभा, अड़गड़ी, गोना गरिबा एवं कोडोमाली जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से अतिक्रमण का दबाव बना हुआ है। इसके बावजूद, पिछले तीन वर्षों में प्रशासन ने गंभीर प्रतिरोध और जानलेवा हमलों का सामना करते हुए इचराड़ी (कोडोमाली), टांगरन (गरिबा) एवं गोना नवापारा क्षेत्रों से **300 हेक्टेयर से अधिक अतिक्रमण हटाकर** महत्वपूर्ण वन्यजीव आवासों को पुनर्स्थापित किया है।

इसके विपरीत, संरक्षित वनों के बाहर के क्षेत्रों (जैसे नवरंगपुर-ओडिशा, देवभोग, छुरा एवं फिंगेश्वर) में वनों की कमी और भूमि उपयोग परिवर्तन के कारण भूजल स्तर में लगातार गिरावट आई है, जो जल संकट और दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती बन गई है।

 संभावित विकल्प और भविष्य की राह (इको-टूरिज्म)

प्रशासन ने ग्रामीणों की वास्तविक आवश्यकताओं को समझते हुए वन्यजीव संरक्षण और कानूनी प्रावधानों के अनुरूप निम्नलिखित संभावित विकल्प सुझाए हैं:

 1. वर्तमान सौर ऊर्जा प्रणालियों की मरम्मत एवं सुदृढ़ीकरण।

 2. आवश्यक आवागमन हेतु मौजूदा मिट्टी-मुरूम सड़कों का रखरखाव एवं सुधार, जिससे पारिस्थितिक क्षति न्यूनतम रहे।

 3. इच्छुक ग्रामीणों का टाइगर रिज़र्व के बाहर बेहतर क्षेत्रों में विस्थापन, जहाँ उन्हें बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली और पक्की सड़क जैसी सुविधाएं मिल सकें।

आज संरक्षण, कल समृद्ध आजीविका:

उदन्ती-सीतानदी को मध्य भारत के प्रमुख इको-टूरिज्म गंतव्य के रूप में विकसित करने की अपार संभावनाएं हैं। दीर्घकालिक परिकल्पना के तहत स्थानीय युवाओं को नेचर गाइड, सफारी चालक, होम-स्टे संचालक, इको-कैंप प्रबंधक, हस्तशिल्प उत्पादक, वन्यजीव ट्रैकर और नौका चालक के रूप में स्थायी रोजगार के अवसर सृजित किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ शासन इस बात के लिए प्रतिबद्ध है कि इको-टूरिज्म परियोजनाओं का सर्वाधिक लाभ स्थानीय ग्रामीणों को मिले।

 जनता से मार्मिक अपील

अंत में, टाइगर रिजर्व प्रशासन ने सभी नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, ग्रामवासियों और सामाजिक संगठनों से अपील की है कि वे इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने में अपना सहयोग दें। अतिक्रमण एवं अवैध गतिविधियों को रोकने में मदद करें और ऐसे टिकाऊ समाधानों की दिशा में मिलकर कार्य करें जिससे मानव कल्याण और वन्यजीव संरक्षण दोनों सुनिश्चित हो सकें।


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