राम मंदिर में चोरी और मौन की राजनीति: आस्था पर सवाल, आखिर जवाबदेही किसकी.?
उत्तम साहू, धमतरी
अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, विश्वास और वर्षों के संघर्ष का प्रतीक माना जाता है। ऐसे में यदि राम मंदिर परिसर में चोरी अथवा सुरक्षा में सेंध जैसी घटना सामने आती है, तो यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों रामभक्तों की भावनाओं से जुड़ा विषय बन जाता है। स्वाभाविक रूप से ऐसी घटना के बाद लोगों की अपेक्षा होती है कि समाज, धर्म और सनातन की बात करने वाले प्रमुख चेहरे इस पर खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दें और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करें।
घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक बड़ा वर्ग इस बात को लेकर नाराज दिखाई दे रहा है कि राम मंदिर की सुरक्षा से जुड़े इस गंभीर विषय पर कई चर्चित कथावाचकों, धार्मिक नेताओं और सार्वजनिक मंचों पर स्वयं को रामभक्त बताने वाले प्रभावशाली लोगों की ओर से अपेक्षित प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। लोगों का कहना है कि जब राम के नाम पर बड़े-बड़े आयोजन होते हैं, धार्मिक मंच सजते हैं और भक्ति की चर्चा होती है, तब अनेक लोग अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं, लेकिन जब राम मंदिर की प्रतिष्ठा और सुरक्षा पर प्रश्न उठता है, तब वही आवाजें खामोश नजर आती हैं।
हालांकि यह भी सच है कि किसी व्यक्ति की प्रतिक्रिया का अभाव उसके विचारों या संवेदनाओं का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। कई बार लोग जांच पूरी होने की प्रतीक्षा करते हैं या सार्वजनिक टिप्पणी से बचते हैं। फिर भी, जनभावनाओं का सम्मान करते हुए यह अपेक्षा की जाती है कि समाज में प्रभाव रखने वाले लोग ऐसे मामलों पर स्पष्ट और जिम्मेदार रुख अपनाएं।
राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आस्था का केंद्र है। इसलिए वहां हुई किसी भी चोरी, सुरक्षा चूक या अनियमितता की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होना आवश्यक है। साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। श्रद्धालुओं का विश्वास बनाए रखना प्रशासन और मंदिर प्रबंधन दोनों की जिम्मेदारी है।
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दों पर हमारी संवेदनशीलता परिस्थितियों के अनुसार बदल जाती है, या फिर हम हर मामले में समान रूप से मुखर और सजग रहते हैं। राम के नाम पर राजनीति, प्रचार या लोकप्रियता प्राप्त करने वालों के लिए भी यह आत्ममंथन का विषय है कि आस्था केवल उत्सव और आयोजनों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि संकट के समय भी उसके प्रति जिम्मेदारी दिखाई देनी चाहिए।
फिलहाल देश की नजर इस बात पर है कि जांच एजेंसियां इस मामले में क्या निष्कर्ष निकालती हैं और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई होती है। क्योंकि करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए यह केवल चोरी की घटना नहीं, बल्कि उनकी आस्था और विश्वास से जुड़ा प्रश्न है। राम मंदिर की गरिमा और सुरक्षा पर उठे हर सवाल का जवाब मिलना ही चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं का विश्वास अटूट बना रहे।

